हीन भावना आए तो उसे कमजोरी न मानकर ताकत बनाएं। मुनि श्रमण सागर जी
राघौगढ़ 15 अक्टूबर।
दिगंबर जैन आचार्य इस सदी के महान संत विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, महा तपस्वी, औजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने राघौगढ़ में जारी श्रमण धारा प्रवचन माला के अंतर्गत गुरुवार को विद्यासागर सभागार में विशाल विधानसभा को संबोधित करते हुए ‘हीन भावना से कैसे बचें’ इस विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए कहा अगर मन में हीन भावना आती है तो उसे अपनी कमजोरी न मानकर ताकत बनाएं। परिवार, समाज, राजनीतिक क्षेत्र, व्यापारिक क्षेत्र, पढ़ाई के क्षेत्र, प्रतियोगी परीक्षाओं, खेलो आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें आपसे आगे कोई जा रहा है तो आपके मन में हीन भावना आती है। हीन भावना आने से अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। यहां तक स्थिति बनती है कि जीवन से निराश होकर आत्म हत्या जैसे अनुचित कदम उठा लेते हैं।
मुनिराज ने प्रवचन में हीन भावना से बचने चार उपायों का उल्लेख किया। पहला हीन भावना जिस कारण से आ रही है उसे हावी न होने दें और अपनी ताकत बनाएं एक व्यक्ति के एक्सीडेंट में दोनों पैर कट गए थे उसने हिम्मत नहीं हारी और पेंटिंग की कला सीख कर नाम कमाया। दूसरा आपके अंदर जो विशेषता छुपी है उसे ऊपर उठाएं उदाहरण देते हुए कहा वैभव रघुवंशी ने 15 वर्ष की उम्र में क्रिकेट में उच्च स्थान प्राप्त किया है। आपने यह भी कहा जिनके माल में दम होता है वह विज्ञापन नहीं करते। और वह भारतीय टीम का सदस्य है। तीसरा आपके अंदर जिन कमियों के कारण हीन भावना आ रही है। आपकी ग्रहण करने की क्षमता की कमी है।
इसको जैन दर्शन में क्षयोपसम कमी कहते हैं। आपने सुप्रसिद्ध महाकवि कालिदास का उदाहरण दिया। उन्होंने दृढ़ निश्चय कर विद्वानों एवं आश्रमों में रहकर शिक्षा ग्रहण की और अपनी पत्नी को यह बताया कि अब मैं अनपढ़ गवार नहीं हूं। कालिदास ने आत्मविश्वास पूर्वक सफलता पाई और मेघदूत जैसे भाग काव्य के रचयिता बन गए। चौथा उपाय हीन भावना से बचने का जैन दर्शन के अनुसार पुण्य संचय करना है। भगवान की निष्काम व्यक्ति के साथ-साथ पूजन दान उपवास से भी पूण्य संचय होता है। आपने कहा हर व्यक्ति में अच्छाई के साथ बुराई भी होती है। हम जीवन भर उसकी बुराई ही देखते रहते है। अच्छाइयों को ग्रहण करने का प्रयास करें। आचार्य विद्यासागर जी महाराज के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा जलने से पहले जलना छोड़ दो। यह मत सोचो मैं अकेला हूं आत्मविश्वास पूर्वक कहो कि मैं अकेला ही काफी हूं। प्रतिदिन अनुसार मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने स्व रचित कविता सुनाई कविता का शीर्षक है “मानो ना मानो बात तो सही है।”
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
