*वर्तमान में जीना सीखें, अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं से मुक्त होने पर मिलेगी शांति” : मुनिश्री समतासागर महाराज*

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“*वर्तमान में जीना सीखें, अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं से मुक्त होने पर मिलेगी शांति” : मुनिश्री समतासागर महाराज*

कुण्डलपुर(म.प्र.)।

जीवन में सुख-शांति और निराकुलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अतीत की स्मृतियों तथा भविष्य की कल्पनाओं में उलझने के बजाय वर्तमान में जीना सीखना चाहिए। जो बीत चुका है, उसे बार-बार याद करने और जो आने वाला है, उसकी चिंता करने से मन अशांत रहता है। अपने जीवन को शांत और संतुलित बनाने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति गलतियां करने से बचे, लेकिन पुराने प्रसंगों और संबंधों से जुड़ी मानसिक गांठों को छोड़ना भी सीखे।

 

 

यह बात निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कुण्डलपुर में प्रवचन के दौरान कही।राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने आचार्य श्री के दोहे ‘भूल नहीं पर भूलना, शिवपथ में वरदान। भूल नदी गिरि को करे, सागर का संधान।’ की व्याख्या करते हुए कहा कि भूल करना और भूलना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। भूल अर्थात गलती करने से बचना चाहिए, लेकिन जीवन में जिन बातों, घटनाओं और प्रसंगों को मन ने स्मृतियों के रूप में पकड़ रखा है, उनसे धीरे-धीरे मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। स्वयं को कभी नहीं भूलना है, बल्कि उन बाहरी विषयों और बीती घटनाओं के मोह से बचना है, जो मन को बार-बार अशांत करते हैं।मुनि श्री ने नदी और समुद्र का उदाहरण देते हुए समझाया कि नदी पर्वत से निकलती है, लेकिन आगे बढ़ते हुए वह अपने उद्गम पर्वत से दूर होती जाती है और समुद्र तक पहुंचने का संधान करती है। इसी प्रकार आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले साधक को भी उन संस्कारों और आसक्तियों से आगे बढ़ना होगा, जिनसे उसका मन बंधा हुआ है। जब तक व्यक्ति पुरानी घटनाओं, संबंधों और संपत्ति से मन का संबंध बनाए रखेगा, तब तक उसके भीतर व्याकुलता बनी रहेगी।उन्होंने कहा कि मनुष्य की स्मृतियां अतीत से जुड़ी होती हैं, जबकि भविष्य के संबंध में वह केवल कल्पनाएं और योजनाएं बनाता है। अनुभव केवल वर्तमान का होता है। जब मनुष्य का मन अतीत में उलझा रहता है या भविष्य की योजनाओं में भटकता है, तब वह वर्तमान को पूरी तरह जी ही नहीं पाता। इसलिए जीवन में सजगता और सावधानी आवश्यक है। वर्तमान में रहकर अपने कर्तव्यों को समझना और सामने उपस्थित अवसर का सदुपयोग करना ही सार्थक जीवन का आधार है।

 

 

मुनि श्री ने कहा कि संसारी प्राणी अक्सर ‘करूंगा’ और ‘किया था’ के बीच ही जीवन गुजार देता है। वह भविष्य की योजनाएं बनाता रहता है और अतीत में किए गए कार्यों को याद करता रहता है। इस बीच वर्तमान उसके हाथ से निकल जाता है। भोजन की थाली सामने रखी होने पर भी व्यक्ति कभी बीते हुए स्वाद को याद करता है तो कभी अगले दिन क्या खाना है, इसकी कल्पना करता है। वह सामने रखे भोजन का आनंद लेना भूल जाता है। इसी प्रकार जीवन में जो उपलब्ध है, उसका महत्त्व व्यक्ति को अक्सर उसके दूर हो जाने के बाद समझ में आता है।

 

उन्होंने दांत और जीभ का उदाहरण देते हुए कहा कि जब तक सभी दांत सुरक्षित रहते हैं, तब तक उनका महत्त्व महसूस नहीं होता, लेकिन एक-दो दांत निकल जाने पर जीभ बार-बार उसी खाली स्थान पर पहुंचती है। मनुष्य की प्रवृत्ति भी ऐसी ही है। जो उसके पास है, उसकी कद्र नहीं करता और जो चला गया है, उसी के बारे में सोचता रहता है। जो आने वाला है, उसकी कल्पना में भी उलझा रहता है। इस मानसिकता के कारण वह वर्तमान में उपलब्ध सुख और अवसरों का अनुभव नहीं कर पाता।

 

मुनि श्री ने कहा कि निराकुल जीवन जीने के लिए मन को बाहरी विषयों की अनावश्यक उलझनों से मुक्त करना होगा। शांति का संबंध बाहरी परिस्थितियों से अधिक अपने परिणामों और मन की अवस्था से है। जब मन पुराने संस्कारों की पकड़ से छूटता है, तभी वास्तविक निराकुलता का अनुभव संभव होता है।

 

उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक विद्वान ने आचार्य श्री से कहा कि उसने अनेक ग्रंथों का स्वाध्याय कर लिया, फिर भी मन को शांति नहीं मिली। जब उसने व्यवहारिक उपाय पूछा, तो उसे चेक, चाबी और चिट्ठी के तीन चक्करों से मुक्त होने की सीख दी गई। चेक धन-संपत्ति की चिंता, चाबी अधिकार और स्वामित्व के मोह तथा चिट्ठी बाहरी समाचारों और संदेशों में उलझे रहने का प्रतीक है। इस प्रसंग के माध्यम से मुनि श्री ने समझाया कि केवल शास्त्रों का अध्ययन कर लेना पर्याप्त नहीं है। जब तक व्यक्ति अपने व्यवहार में आसक्ति और अनावश्यक उलझनों को कम नहीं करेगा, तब तक शांति का अनुभव कठिन रहेगा।

प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने बड़े बाबा के अभिषेक की तैयारी का उल्लेख करते हुए कहा कि दूर-दूर से श्रद्धालु भगवान के चरणों में श्रद्धा और समर्पण के साथ आते हैं। विशुद्ध भावों से की गई भक्ति आत्मकल्याण की प्रेरणा देती है। व्यक्ति को बाहरी धार्मिक क्रियाओं के साथ अपने भावों की शुद्धि पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि जीवन की वास्तविक शांति भीतर की निर्मलता और आसक्ति से मुक्ति में निहित है।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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