हर किसी से समझे जाने की अपेक्षा छोड़ देना ही परिपक्वता की पहचान : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

हर किसी से समझे जाने की अपेक्षा छोड़ देना ही परिपक्वता की पहचान : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

‘जहां पहले प्रतिक्रिया होती थी, वहां अब मौन होता है; यही मौन मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है’

मौन साधना एवं एकांतवास के दौरान आचार्यश्री का प्रेरक संदेश

औरंगाबाद।

मनुष्य के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब वह चाहता है कि हर कोई उसे समझे, उसकी बात सुने, उसकी भावनाओं को जाने और उसकी नीयत को पहचाने। लेकिन समय के साथ जीवन का अनुभव उसे यह सिखा देता है कि हर किसी को समझाना संभव नहीं है और न ही हर किसी से समझे जाने की अपेक्षा करना उचित है। धीरे-धीरे मन मौन रहना सीख जाता है और यही मौन व्यक्ति की आंतरिक शक्ति बन जाता है। यह प्रेरक संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने लिखित संदेश में दिया है।

 

 

 

 

मौन रहना कमजोरी नही, परिपक्वता की पहचान

आचार्यश्री ने अपने संदेश में कहा कि समय के साथ इंसान सीखता है कि हर किसी को समझाना संभव नहीं है और हर किसी से समझे जाने की अपेक्षा करना भी उचित नहीं। फिर धीरे-धीरे मन मौन होना सीख जाता है।

अब किसी के बदलते व्यवहार पर सवाल नहीं करता, किसी की बेरुखी पर शिकायत नहीं करता और किसी के आरोपों पर सफाई नहीं देता। वह बस मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता है।

आचार्यश्री के अनुसार, परिपक्वता की पहचान यही है कि जहां पहले प्रतिक्रिया होती थी, वहां अब मौन होता है। यही मौन मनुष्य को भीतर से सबसे अधिक मजबूत बनाता है। जीवन में हर परिस्थिति पर प्रतिक्रिया देना, हर आरोप का जवाब देना और हर व्यक्ति को अपनी सफाई देना आवश्यक नहीं है। कई बार शांत रहकर आगे बढ़ जाना ही सबसे बेहतर उत्तर होता है।

मन को जीतने की शुरुआत है अनावश्यक प्रतिक्रियाओं का त्याग

आचार्यश्री ने संदेश में कहा कि जिस दिन हमें हर बात का जवाब देना छोड़ना आ गया, उस दिन समझ लेना चाहिए कि हमने अपने मन को जीतना शुरू कर दिया है।

उनका संदेश जीवन में संयम, धैर्य, आत्मचिंतन और मानसिक शांति का महत्व समझाता है। दूसरों के व्यवहार को बदलने की चिंता करने के बजाय अपने मन को शांत रखना, परिस्थितियों को स्वीकार करना और अनावश्यक विवादों से दूर रहना व्यक्ति को आंतरिक मजबूती प्रदान करता है।

आचार्यश्री का यह संदेश समाज को प्रेरणा देता है कि जीवन में प्रत्येक बात का उत्तर शब्दों से देना जरूरी नहीं है। कभी-कभी मौन, मुस्कान और आगे बढ़ जाने का निर्णय ही व्यक्ति की समझदारी और परिपक्वता को प्रकट करता है।

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

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