पूज्य मुनि श्री 108 चिन्मय सागर महाराज(जंगल वाले बाबा)की रामगंज मंडी राजस्थान वर्ष 2007 से जुड़ी स्मृति

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पूज्य मुनि श्री 108 चिन्मय सागर महाराज(जंगल वाले बाबा)की रामगंज मंडी राजस्थान वर्ष 2007 से जुड़ी स्मृति

रामगंजमंडी
रामगंजमंडी राजस्थान कोटा जिले का वह नगर है जो व्यापारिक दृष्टिकोण से कोटा स्टोन वह धनिए के लिए तो जाना जाता है, लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसे पहचाना जाना जाता है।

धार्मिक दृष्टिकोण से हम रामगंज मंडी से जुड़ी उस स्मृति को ताजा करने का प्रयास कर रहे हैं। जो यह दर्शाती है कि यहां पावन संतों के चरण और आशीष इस नगर को सदा मिलती रही है। यह वह क्षण थे। 20 दिसंबर 2007 जब जंगल वाले बाबा मुनि श्री चिन्मय सागर महाराज रावतभाटा कोटा के समीप कोलीपुरा के जंगलों में वर्षा योग उपरांत रामगंज मंडी नगर पधारे थे। पूज्य श्री की नगर वासियों ने भव्य अगवानी की थी।

उन  पलों के छाया चित्रों को संजोकर रखने में उस समय के महामंत्री श्रीमान केवलचंद रावका ने रखा। इसे बरकरार रखने में उनके पुत्र पुत्र वधू सुदेश विभा रावका ने अहम भूमिका निभाई। 20 दिसंबर 2007 की वह प्रातः बेला इनकी अगवानी को रामगंजमंडीआतुर थी। वही पूज्य आर्यिका 105 सम्मेद शिखर मति माताजी एवं पूज्य आर्यिका 105 कैलाश मति माताजी ने भी पूज्य गुरुदेव की मंगल अगवानी की। महाराज श्री ने मूलनायक शांतिनाथ भगवान के दर्शन किए। और समस्त जिनालय के दर्शन कर मंगल उद्बोधन भी प्रदान किया इसके उपरांत पूज्य मुनि श्री की आहारचर्या संपन्न हुई।

संध्या की बेला में मुझे ऐसे पावन गुरुदेव की चरण रज के साथ उनकी वेयावृति करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। इस बेला में पूज्य माताजी संघ एवं महाराज श्री के मध्य धर्म चर्चा का भी अवसर हमें मिला पूज्यश्री ने कोटा के जंगलों में जो धर्म साधना वर्षा योग में की उसका विवरण बताया। ऐसे क्षण सदा सदा अविस्मरणीय हो गए जो एक इतिहास लिख गए।

 

 

 

 

 

अगले दिन आहारचर्या उपरांत शाहजी चौराहा पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित किया था उस समय माताजी की ओर से एक भावभीना भजन मुनि चरणों में समर्पित किया।

 

 

 

 

 

 

इस अवसर पर पूज्यश्री ने अपने उद्बोधन में अहिंसा शाकाहार का पालन करने की बात सभी को कई। इस धर्म सभा का संचालन श्रीमान केवलचंद रावका ने किया। इस बेला में अनेक विशिष्ट व्यक्तियों ने भी अपनी सहभागिता प्रदान की। मुनि श्री ने धर्मसभा में सभी को मांसाहार का त्याग करवाया।

जैन संत तो अनियत बिहारी होते हैं उनके आने न जाने की कोई तिथि नियत नहीं होती है। मुनि श्री ने अपना उद्बोधन पूर्ण किया पूर्ण करते ही मुनि श्री का मंगल विहार हो गया। मुनि श्री ने अपनी वाणी से, अपनी प्रेरणा से ना जाने कितनों का जीवन अन्नत किया। वे आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी स्मृति उनका त्याग उनका समर्पण उनका संयम सदा सभी के लिए एक प्रेरणा एवं आदर्श स्थापित करता है। पूज्य श्री की प्रेरणा व आशीष से आरके पुरम जिन मंदिर का निर्माण हुआ है। इसके साथ ही इसका पंचकल्याणक 2008 में पूज्य मुनि श्री के सानिध्य में ही संपन्न हुआ था।

अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी की रिपोर्ट

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