आचार्य श्री वीर सागर जी का समाधि दिवस भक्ति भाव पूर्वक आचार्य संघ सानिध्य में मनाया गया।

धर्म

आचार्य श्री वीर सागर जी का समाधि दिवस भक्ति भाव पूर्वक आचार्य संघ सानिध्य में मनाया गया।

सीकर

जिस प्रकार मंदिर की शोभा शिखर पर कलशारोहण के बिना नहीं होती है उसी प्रकार मनुष्य जीवन के सार्थकता बिना संयम धारण किया नहीं होती है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी परंपरा के प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर महाराज का अंतर विलय समाधि दिवस आश्विन कृष्णा अमावस्या 10 अक्टूबर पर सीकर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में भक्ति भाव से पूजन कर गुणानुवाद किया गया प्रातकाल श्रीजी के अभिषेक पूजन के बाद आचार्य श्री धर्मसागर सभागृह में श्री वीर सागर जी के चित्र के समक्ष भक्ति भाव पूर्वक पूजन विभिन्न अष्ट द्रव्यों से की गई। पूजन के मंत्रोच्चार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी एवं संघ के साधुओ ने किया। दंग की नसिया सभागृह में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश भावांजलि में बताया कि आज का पावन दिन गुरु स्मृति दिवस है गुरु इच्छाओं ,राग ,द्वेष , परिग्रह से रहित होते होकर हितोपदेसी होते हैं उन्होंने यथार्थ में धर्म प्रभावना कर संघ के साथ अपने जीवन का भी निर्माण किया है ।

ऐसे गुरु मुश्किल से मिलते हैं आप प्रथम आचार्य श्री शांति सागर जी के प्रथम मुनि शिष्य रहे हैं उन्होंने योग्य गुरु की तलाश में ब्रह्मचर्य अवस्था में ही चार प्रकार के रसों का त्याग कर दिया था डॉ राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि एक बार नारियल के आकार का फोड़ा पीठ में होने पर उन्होंने बिना बेहोशी की दवा लिए डॉक्टर को कह दिया आप चीरा लगाकर कार्य कीजिए और आचार्य वीर सागर जी ध्यान में मग्न हो गए उनके शरीर में क्या हो रहा है उसकी उन्हें कोई चिंता या पीड़ा नहीं थी जब डॉक्टर ने कार्य पूरा कर तब आचार्य श्री को बताया कि आप बीमारी ठीक हो गई है तब आचार्य श्री ध्यान से मुक्त हुए । अपने अनेक भव्य जीवो को धर्म के मार्ग पर लगाया जिसमें श्री शिव सागर जी ,श्री धर्म सागर जी श्री श्रुत सागर जी आर्यिका श्री ज्ञानमती जी श्री सुपार्श्व मति क्षुल्लक श्री सुमति कीर्ति जी आदि प्रमुख शिष्य रहे जिन्होंने उनकी यश को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। उनके समाधि दिवस पर नियम लेकर जीवन को सार्थक करना चाहिए जिस प्रकार मंदिर की सुबह कलशारोहण के बिना नहीं होती है उसी प्रकार मनुष्य जीवन की शोभा बिना संयम धारण किया नहीं होती है।आचार्य श्री शांति सागर जी ने लिखित पत्र द्वारा आचार्य पद श्री वीर सागर जी को दिया था । इस अवसर पर अनेक श्रावक वक्ताओं ने आचार्य श्री वीर सागर जी के व्यक्तित्त्व पर प्रकाश डाला पूर्व जिला न्यायाधीश सुकेश जैन जोधपुर ने बताया कि महावीर स्वामी के नाम के दो आचार्य श्री वीर सागर जी ओर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी है। साधुओं में आर्यिका श्री विलोक मति जी ने बताया कि आचार्य श्री कैंची के स्थान पर सुई बन कर समाज को जोड़ने की प्रेरणा देते थे।, मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी ने बताया कि चारित्र धारियों का गुणानुवाद का अवसर पुण्य से मिलता हैं, मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी ने बताया कि आचार्य श्री शांति सागर जी , आचार्य श्री वीर सागर जी की निर्दोष परंपरा में मेरा दीक्षित होना सौभाग्य है।मुनि श्री हितेन्द्र सागर जी ने बताया कि आचार्य श्री वीर सागर जी ने मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका चारों दीक्षा देकर चतुर्विध संघ की स्थापना की।वह ,ज्ञान ,तप, ध्यान, में लीन रहकर यश, ख्याति नाम पूजा से दूर रहे। महेश लालास के अनुसार आश्विन शुक्ल एकम से आचार्य संघ सानिध्य में 9 दिवसीय णमोकार मंत्र का जाप किया जावेगा। 11 अक्टूबर को मंगल कलश ओर अखंड दीपक की स्थापना होकर आचार्य श्री के प्रवचन होगे।20 अक्टूबर को णमोकार विधान की पूजन के बाद विश्व शांति हेतु हवन होगा।

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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