*जीवन का उपवन कैसा हो*
जैन संत*मुनि विशल्यसागर जी*
झुमरीतिलैया कोडरमा
28 सितम्बर श्री दिगम्बर जैन नया मंदिर जी मे परम पूज्य राजकीय अतिथि वाक केशरी जैन मुनि 108 विशल्य सागर जी मुनिराज ने अपनी प्रवचन श्रृंखला में बताया कि खिलें हुए फूलों को सभी पसंद करते ह़ै मुरझाये हुए को कोई पसंद नहीं करता मुरझाये हुए को अलग कर देता है अपने जीवन को उपवन बनाओं जो जीवन भर महके अन्य उपवन तो मुरझा जाते है लेकिन जीवन का उपवन सदा खिला रहता है,महकता रहता है संत पुरुषों ,महापुरुषों के जीवन का उपवन सदा महकता रहा ,सदा खिला रहा उन्हीं के जीवन की उपवन की महक चारों ओर वातावरण को स्वस्थ एवं सुरक्षित रखे हुए है । यदि इस भव की यात्रा तुम्हें करना है तो अपने उपवन को महकाऐ ,खिलाए ।
जो जितना भक्ति में उछलता है वही उतनी ही ऊँचाई में उछलता है भक्ति करने का रस अलग है।
जिनशासन की प्रभावना कितने भी रुपों में कर सकता है positive सोच होना चाहिए भक्ति के अनेकों रुप है वीणा बजाकर,वाद्य बजाकर ,ध्यान लगाकर। भाक्ति कई तरीके से हो सकती है उसका कॊई पैगाम नहीं,भाक्ति की भाषा अन्तरंग की निर्मलता है भाक्ति मस्ती में नहीं ,मस्त होकर की जाती है।उथले बैठोगे तो कोई आनंद नही आयेगा dipli बैठों तो आनंद आयेगा भाक्ति से ही पुण्य का संचय होता है भाक्ति से निधात्ति ,निकाचित कर्म नष्ट हो जाते है महान कार्य करने वाला ही महान पुरुष होता है न पैसों की,न विचारों की,न शब्दों की समय की कृपणता नही होना चाहिए जहाँ ये चारों की कृपणता आ गई वह उपवन नहीं खिलता।सबसे बड़ा कंगाल वही है जिसके पास वचनों की कृपणता है किसी को कुछ दे पाओं य न दे पाओं positive विचार जरूर दे देना क्योंकि अच्छा विचार वाला ही महापुरुष बनता है शुभ विचारों के द्वारा ही शुभ कार्य में प्रगति होती है इस अवसर पर मंगलाचरण संघस्थ अलका दीदी,भारती दीदी ने किया इस अवसर पर विशेष रूप से समाज मे अध्यक्ष प्रदीप पांड्या, मंत्री ललित सेठी ,चातुर्मास संयोजक सुरेन्द काला के साथ बहुत से भक्त उपस्थित थे मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा,नविन जैन
