मोह का क्षय और भावों की विशुद्धि ही मोक्षमार्ग का आधार पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में 10 व 11 अक्टूबर अंतरराष्ट्रीय विद्वत ब्रह्मचारी संगोष्ठी का शुभारंभ, देशभर से 200 विद्वत ब्रह्मचारी लेंगे भाग

धर्म

मोह का क्षय और भावों की विशुद्धि ही मोक्षमार्ग का आधार
पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में 10 व 11 अक्टूबर अंतरराष्ट्रीय विद्वत ब्रह्मचारी संगोष्ठी का शुभारंभ, देशभर से 200 विद्वत ब्रह्मचारी लेंगे भाग
आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर 10 व 11 अक्टूबर को होंगे विशेष सत्र
कोटा, 09 अक्टूबर 2026।

शुक्रवार, आश्विन कृष्ण चतुर्दशी के अवसर पर पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 68 एवं 69 की व्याख्या करते हुए धर्म, संयम, मोह के क्षय और आत्मकल्याण के विषय में प्रेरणादायी प्रवचन दिए। महाराज श्री ने कहा कि मोक्षमार्ग की वास्तविक साधना बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि आंतरिक भावों की विशुद्धि में निहित है। जब तक मोह, ममत्व और कषायों का क्षय नहीं होता, तब तक सच्चे चारित्र की पूर्णता प्राप्त करना कठिन है।

 

 

 

संकल्प, संयम और भावों की पवित्रता से प्रशस्त होता है मोक्षमार्ग
महाराज श्री ने दिग्व्रत के संदर्भ में संकल्प की महत्ता बताते हुए कहा कि दृढ़ संकल्प धर्माचरण का आधार है। जब व्यक्ति व्रत-नियमों को अंगीकार कर कर्मों से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ता है, तब अनेक परिस्थितियों में उसकी परीक्षा होती है। ऐसी स्थिति में आस्था, धैर्य और संयम बनाए रखना आवश्यक है। व्रतों का पालन केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि अंतरंग भावों को निर्मल बनाने का माध्यम है।
उन्होंने कहा कि हिंसा केवल शरीर के माध्यम से ही नहीं, बल्कि मन में उत्पन्न द्वेष, क्रोध और दुर्भावनाओं से भी होती है। भावहिंसा से बचने के लिए मन के विकारों को पहचानना और उन्हें दूर करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। पूजा और धार्मिक क्रियाओं की सार्थकता तभी है, जब उनके माध्यम से आत्मा के भावों में पवित्रता आए।

 


महाराज श्री ने जिनवाणी के नियमित स्वाध्याय पर बल देते हुए कहा कि आगम का अध्ययन आत्मा को सही दिशा प्रदान करता है। जिनवाणी का स्वाध्याय, चिंतन और मनन कर्मनिर्जरा में सहायक बनता है। प्रत्येक श्रावक को अपनी शक्ति के अनुसार पापों से बचने, संयम का पालन करने और धर्म के प्रति अटूट आस्था बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म का अवसर सौभाग्य और पुण्य के उदय से प्राप्त होता है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब व्यक्ति अपनी रुचि और आस्था को धर्माचरण में परिवर्तित करता है। पाप से भय का अभाव, धर्म के प्रति अरुचि और आत्मकल्याण के प्रति उदासीनता साधना में बाधक बनती है। अल्पारंभ और अल्पपरिग्रह का जीवन अपनाने से जीवों की हिंसा और कर्मबंध की संभावनाओं को कम किया जा सकता है।
सामायिक का वास्तविक अर्थ समता धारण करना
महाराज श्री ने कहा कि मोक्षमार्ग बाहर से अधिक भीतर की यात्रा है। सामायिक का वास्तविक अर्थ समता धारण करना तथा संसार के कार्य-व्यापार और मानसिक विकारों से मन को हटाकर आत्मस्वरूप में स्थिर होना है। आत्मकल्याण के लिए बारह भावनाओं का चिंतन करना चाहिए। संसार की अनित्यता, शरीर की अशुचिता और सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता पर विचार करने से भावों में विशुद्धि आती है और आत्मचिंतन की प्रेरणा मिलती है।
श्लोक क्रमांक 69 की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि शरीर के प्रति अत्यधिक ममत्व और संसार के प्रति आसक्ति जीव को बार-बार संसार में भटकाती है। ज्ञान की सार्थकता केवल जान लेने में नहीं, बल्कि उसके अनुरूप जीवन में परिवर्तन लाने और विकारों से निवृत्त होने में है। सच्चे ज्ञान का फल विषयों की आसक्ति से दूर होना, फल की इच्छा का त्याग करना और आत्महित की दिशा में आगे बढ़ना है।
महाराज श्री ने कहा कि दीक्षा का उद्देश्य केवल बाहरी वेश परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मबल और आंतरिक शिक्षा का विकास है। आत्मबल बढ़ने पर ही व्यक्ति व्रतों का दृढ़ता से पालन करते हुए संयम के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। प्रत्येक श्रावक को अपने भावों की निरंतर समीक्षा करते हुए मोह, ममत्व और कषायों को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
महाराज श्री का संदेश है कि दृढ़ संकल्प, जिनवाणी का नियमित स्वाध्याय, व्रत-नियमों के प्रति आस्था और भावों की निरंतर विशुद्धि ही आत्मकल्याण का आधार है। जब मनुष्य बाहरी संसार में उलझने के स्थान पर अपने भीतर लौटकर आत्मचिंतन करता है, तभी सच्ची शांति, कर्मनिर्जरा और मोक्षमार्ग की दिशा प्रशस्त होती है।
10 व 11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय विद्वत ब्रह्मचारी संगोष्ठी
मुख्य संयोजक हुकम जैन काका ने बताया कि 10 एवं 11 अक्टूबर को आचार्य भगवंत श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अंतरराष्ट्रीय विद्वत ब्रह्मचारी संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। इसमें देशभर से लगभग 200 विद्वत ब्रह्मचारी भाग लेंगे। संगोष्ठी में प्रातःकालीन, द्वितीय सत्र एवं सायंकालीन सत्रों में विभिन्न विषयों पर विद्वानों द्वारा विचार प्रस्तुत किए जाएंगे।
कार्यक्रम का मंगलाचरण आचार्य विद्यासागर पाठशाला की संयोजिकाओं द्वारा किया जाएगा। इसके बाद चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट के धार्मिक आयोजन होंगे। इन आयोजनों का पुण्यार्जन खटोड़गढ़ वाला परिवार, शॉपिंग सेंटर, कोटा तथा ब्यावर-मुंबई निवासी जैन परिवारों द्वारा किया जाएगा। पाद प्रक्षालन का पुण्यलाभ हरसोरा परिवार, दादाबाड़ी द्वारा प्राप्त किया जाएगा। भोजन व्यवस्था का पुण्यार्जन प्रकाश जी, अमित, शिल्पा, धरांश, राधिका एवं वेद द्वारा किया जाएगा।
संगोष्ठी की अध्यक्षता ब्रह्मचारी धर्मेंद्र भैया जी, जयपुर करेंगे। सारस्वत अतिथि के रूप में ब्रह्मचारी मुकेश भैया जी, इंदौर उपस्थित रहेंगे, जबकि मंच संचालन ब्रह्मचारी सुनील भैया जी, इंदौर द्वारा किया जाएगा। संगोष्ठी का उद्देश्य आचार्यश्री के जीवन-दर्शन, साधना, साहित्य, शिक्षा और समाज को दिए गए आध्यात्मिक योगदान पर सार्थक चिंतन करना है।
आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन राजेंद्र जी, रजनी जी एवं समस्त गोधा परिवार द्वारा किया गया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने प्राप्त किया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान आलोक एवं बंधित मोदी परिवार, ललितपुर; श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार तथा श्रीमान स्वरूप चंद, सतीश एवं भागचंद पालीवाल परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव से किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ श्रीमान धनराज एवं संजय जी को प्राप्त हुआ। मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य महावीर भारती जी मित्तल परिवार, पवास को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर हर्षा कोटिया द्वारा संपन्न किया गया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
“मोक्षमार्ग की प्रगति बाहरी आडंबरों से नहीं, बल्कि मोह के क्षय, कषायों के शमन और भावों की विशुद्धि से होती है। जिनवाणी का स्वाध्याय करें, व्रत-संयम में दृढ़ रहें और प्रत्येक क्षण आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ें।”
• शीर्षक में संगोष्ठी को आज से शुरू बताया गया है, जबकि विवरण के अनुसार मुख्य आयोजन 10–11 अक्टूबर को है। इसलिए समाचार में आज के प्रवचन और आगामी संगोष्ठी को अलग-अलग रखा गया है।
• पुण्यार्जक परिवारों के नामों की लंबी सूची में कुछ नामों के बीच विराम-चिह्न स्पष्ट नहीं हैं। मुद्रण से पहले परिवारों के नामों और पुण्यार्जन के विवरण की पुष्टि कर लें।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

 

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