# पुण्यतिथि विशेष: सुरों के साधक दादा रवींद्र जैन को भावभीनी श्रद्धांजलि
## जैन भक्ति, अहिंसा और एकता का संदेश देने वाले महान संगीतकार की स्मृतियां आज भी जीवंत
भारतीय संगीत जगत में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपनी कला से लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ जाते हैं। प्रख्यात संगीतकार, गीतकार और भजन गायक दादा श्री रवींद्र जैन उन्हीं महान विभूतियों में से एक थे। 9 अक्टूबर 2015 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके मधुर सुर, भावपूर्ण रचनाएं और आध्यात्मिक संदेश आज भी करोड़ों लोगों के हृदय में गूंज रहे ।
दादा रवींद्र जैन ने अपने संगीत के माध्यम से भक्ति को स्वर दिया और शब्दों के जरिए भावनाओं को ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान की, जो सीधे आत्मा तक पहुंचती है। हिंदी सिनेमा से लेकर धार्मिक भजनों तक उनकी प्रतिभा का प्रभाव दिखाई देता है। रामायण जैसे लोकप्रिय धारावाहिक के संगीत ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। दृष्टिबाधित होने के बावजूद उन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा, साधना और संगीत के प्रति समर्पण से जो मुकाम हासिल किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
जैन भक्ति को सुरों में पिरोकर दिया एकता का संदेश
दादा रवींद्र जैन का जैन धर्म और भगवान महावीर के सिद्धांतों के प्रति विशेष लगाव उनकी भक्ति रचनाओं में भी झलकता था। उनका भजन **’मस्तकाभिषेक महावीर की मृगवाणी’** जैन समाज की धार्मिक भावनाओं और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ी एक विशेष पहचान रखता है।
उनकी रचनाओं का भाव केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं था, बल्कि उनमें संपूर्ण जैन समाज को एक सूत्र में बांधने की प्रेरणा भी समाहित थी। जैन धर्म में विभिन्न परंपराओं और संप्रदायों के बीच आपसी सद्भाव का संदेश देते हुए उनके भजन के ये भाव विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—
*हम नहीं दिगंबर, श्वेतांबर, तेरापंथी, स्थानकवासी,
हम एक मत के विश्वासी, एक मत के अनुयायी।*
इन पंक्तियों में निहित भावना यही है कि संप्रदायों की अलग-अलग परंपराओं के बावजूद जैन समाज की मूल आस्था, अहिंसा, करुणा और आध्यात्मिक मूल्यों की जड़ें एक हैं। आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर एकता और भाईचारे को अपनाना ही उनके संदेश की वास्तविक सार्थकता है।
### श्रवणबेलगोला के महामस्तकाभिषेक से जुड़ीं अविस्मरणीय स्मृतियां
कर्नाटक के पवित्र जैन तीर्थ श्रवणबेलगोला में भगवान बाहुबली, जिन्हें गोमटेश्वर के नाम से भी जाना जाता है, का महामस्तकाभिषेक जैन समाज का विश्वविख्यात धार्मिक आयोजन है। इस ऐतिहासिक महोत्सव और भगवान बाहुबली की महिमा को संगीत के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने में दादा रवींद्र जैन की भूमिका को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।
आपके द्वारा साझा की गई स्मृतियों के अनुसार, वर्ष 1982 से 2006 तक आयोजित महामस्तकाभिषेक के अवसरों पर उनकी उपस्थिति और भजनों की प्रस्तुति इस आयोजन से उनके गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। वर्ष 2006 में श्रवणबेलगोला में भगवान गोमटेश्वर के महामस्तकाभिषेक के अवसर पर उनके द्वारा प्रस्तुत गीत की स्मृति आज भी भावुक कर देती है।
उनसे जुड़ी इन स्मृतियों में यह भाव विशेष रूप से उभरता है कि श्रवणबेलगोला की पवित्र भूमि पर रचा और गाया गया भक्ति गीत देशभर में गूंज उठा। यह किसी कलाकार की सफलता मात्र नहीं, बल्कि संगीत के माध्यम से तीर्थ की महिमा और जैन धर्म के संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाने का उदाहरण भी है।
### संगीत की सीमाओं से परे था उनका व्यक्तित्व
दादा रवींद्र जैन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने संगीत को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे भक्ति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बनाया। उनकी रचनाओं में श्रद्धा थी, शब्दों में गहराई थी और स्वरों में ऐसी मिठास थी, जो श्रोताओं को भावविभोर कर देती थी।
उनके व्यक्तित्व से यह प्रेरणा मिलती है कि प्रतिभा का वास्तविक मूल्य उसके माध्यम से समाज को दिए गए संदेश में निहित होता है। उन्होंने अपनी कला से धर्म और संस्कृति के प्रति अनुराग जगाया तथा संगीत प्रेमियों को ऐसी अमूल्य विरासत दी, जो समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जाएगी।
### जैन समाज और संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति
आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए मन श्रद्धा से भर जाता है। उनका जाना केवल एक महान संगीतकार का बिछुड़ना नहीं था, बल्कि उस व्यक्तित्व का विदा होना था, जिसने अपने सुरों से आस्था को अभिव्यक्ति दी और अपनी रचनाओं से एकता का संदेश प्रसारित किया।
दादा रवींद्र जैन के योगदान को इतिहास के पन्नों में सदैव सम्मान के साथ याद किया जाएगा। उनकी मधुर आवाज, भक्ति से ओतप्रोत रचनाएं और जैन समाज से जुड़ी उनकी स्मृतियां हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी।
**विनम्र श्रद्धांजलि!**
दादा श्री रवींद्र जैन जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। मेरी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि। परमात्मा से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।
**— अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी**



