इंद्रियों का दास कभी बादशाह नहीं बन सकता संभव सागर महाराज
विदिशा
इन्द्रियों का दास” कभी बादशाह नहीं बन सकता”उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108सम्भवसागर महाराज ने श्री शांतिनाथ दि. जैन मंदिर स्टेशन पर व्यक्त किये।उन्होंने कर्म प्रकृति की चर्चा को आगे बढ़ाते हुये कहा कि आसक्ति और मोह व्यक्ति को बादशाह से दास बना देता है,आत्मा और कर्म की यह लडाई आज की नहीं है यह अनादिकाल से चली आ रही है।
जैसे सूर्य पर कोहरा हमला करता है,तो सूर्य छिप जाता है और जैसे ही कोहरा छंटता है तो सूर्य प्रकट हो जाता है उसी प्रकार आत्मा के प्रदेशों पर जब जब ज्ञानावरणीय कर्म हमला करता है तो आत्मा के ज्ञान गुण छिप जाते है और जैसे ही उस कर्म का प्रभाव घटता है,तो ज्ञान गुण प्रकट हो जाता है इसी प्रकार मोहनीय कर्म का नशा है,जो मदिरा पान के नशा के समान है,यह हमारे चारित्र गुण को नष्ट करता है, उन्होंने कहा कि आठ कर्मों में यदि सबसे बड़ा शत्रु है तो वह “मोहनीय कर्म” है वह कर्मों का सेनापति है,मुनि श्री ने कहा कि आप शास्त्र स्वाध्याय करते है तथा जानते है कि एक दृव्य दूसरे दृव्य का कुछ नहीं कर सकता फिर कोई स्वर्गवासी हो जाता है तो उसके पीछे आप रोते क्यों हो? का जवाब देते हुये मुनि श्री ने कहा “मोहनीय कर्म” ही है जो आपको रुला रहा है यह स्थिति किसी एक की नहीं यह स्थिति सभी के साथ आती है,उस स्थिति आने के पहले अपने आपको संभाल लेना चाहिए मुनि श्री ने कहा कि कर्मबंध की पूरी प्रक्रिया में राग और द्वेष ही अपना कार्य करते है,उन्होंने अंतराय कर्म की बात करते हुये हुये कहा मान लीजिये आपके मन में दान देने का भाव है लेकिन कोई न कोई निमित्त बनकर सामने अंतराय आ जाता है, भोग उपभोग की पूरी सामग्री आपके पास मौजूद है फिर भी आप उसका उपयोग नहीं कर सकते यह भी एक अंतराय है। उन्होंने कहा कि कभी कभी तो हम मन से ऐसे पाप का बंध कर लेते है जो हमने किये ही नहीं उन्होंने एक कथानक सुनाते हूये कहा कि तंदुल के आकार का एक मच्छ जो कि राघव नाम के बड़े मच्छ के कान में रहता है,उसका भोजन उस कान के मल से ही पूर्ण हो जाता है,एक दिन वह देखता है कि राघव मच्छ मुंह खोलकर सो रहा है और उसके मुंह में कही मछलियां आ रही और जा रही उसके मन में विचार आता है कि यह राघव मच्छ बड़ा बेबकूफ है यदि यह अपना मुंह बंद कर ले तो इसे भोजन तलाशने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी इसके स्थान पर मैं होता तो एक को भी नहीं छोड़ता”




मुनि श्री ने कहा कि उसके खाने की सामर्थ नहीं है,और उसने एक भी जीव की हत्या नहीं की फिर भी उसने सातवें नर्क की आयु बंध कर लिया मुनि श्री ने कहा कि ऐसे ही संसार में अनेक वस्तुएं ऐसी है जो हमारी सामर्थ से बाहर है उनका न तो उपयोग है न उपभोग फिर भी हम उनसे मानसिक पाप कर लेते है।
मुनि श्री ने कहा सबसे ज्यादा पाप बंध करने की डिब्बी तो 24 घंटे आपके साथ ही रहती है, -90साल के दादाजी और दादीजी है वह भी अपना भाव खराब कर सकते है 10 साल के बच्चे और बच्चीओं के भाव खराब हो सकते है, इसलिये कम से कम सभी का रात्री 9 बजे से सुबह 6 बजे तक मोबाईल का त्याग रखने का नियम होंना चाहिये।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया स्वर्ण प्राशन कार्यक्रम के लिये श्री सकल दि. जैन समाज समिति द्वारा संयोजक श्री संजय सेठ को नियुक्त किया गया है, जिसकी सभी ने अनुमोदना की। उपरोक्त कार्यक्रम के लिये जिला कलेक्टर ने एक परिपत्र सभी शासकीय एवं अशासकीय स्कूलों को जारी किया है, जिसमें 8 जनवरी को आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज के समाधि दिवस के पूर्व बेला में समाज द्वारा सभी बच्चों को स्वर्ण प्राशन पिलाने में सहयोग करने को कहा है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

