*जिनकुल में जन्म मिलना सौभाग्य, उसे सार्थक करना हमारा पुरुषार्थ– आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज*
नेमी नगर जैन कॉलोनी,इंदौर।
प्रवचन में कहा गया कि हम सभी को सबसे पहले अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है। हम दूसरों के आंगन में झांककर उनकी कमियां खोजते रहते हैं, लेकिन अपने आंगन और अपने मन में झांकने वाला कौन है? दूसरों के भीतर छिपे दोषों को ललकारने से पहले स्वयं के भीतर छिपे विकारों को पहचानना और दूर करना जरूरी है। पर-उपदेश देने में हम भले ही कुशल हों, लेकिन स्वयं के आचरण पर विचार करने की आवश्यकता है। हम सुधरेंगे, तभी समाज और संसार सुधरेगा।
प्रवचन में कहा गया कि दुनिया में हर मिनट अनेक बच्चों का जन्म होता है, लेकिन हर जन्म सार्थक नहीं होता। सौभाग्यशाली वे हैं जिन्हें जिनकुल में जन्म मिला और जिनके जीवन में जैन धर्म के संस्कार प्राप्त हुए। हालांकि केवल जन्म लेने मात्र से कोई धर्मात्मा नहीं बन जाता। धर्म जन्म से नहीं, बल्कि पुरुषार्थ से मिलता है। धर्म को अर्जित करना पड़ता है और तत्त्वज्ञान के बल पर व्यक्ति सच्चा धर्मात्मा बनता है।
यह भी सौभाग्य की बात है कि जिस परिवार में जिनधर्म का पालन हो रहा हो, ऐसे परिवार में जन्म प्राप्त हो। जिनकुल की प्राप्ति जीवन को धर्म और आत्मकल्याण की दिशा देने का अवसर है। इसलिए अपने जीवन के प्रत्येक शुभ अवसर—जन्मदिवस, वर्षगांठ अथवा अन्य समारोह—को केवल सांसारिक उत्सव न बनाकर धार्मिक स्वरूप देना चाहिए। ऐसे अवसरों पर विधान, पूजन, धार्मिक यात्रा और धर्मप्रभावना जैसे आयोजन किए जाएं, ताकि उत्सव आत्मकल्याण का माध्यम बन सके।
प्रवचन में संदेश दिया गया कि जिनकुल में जन्म मिलना सौभाग्य है, लेकिन उस जन्म को सार्थक बनाना हमारा पुरुषार्थ है। स्वयं के भीतर झांककर दोषों को दूर करना, जिनधर्म का पालन करना और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना ही मानव जीवन की वास्तविक सफलता है।
माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





