*राष्ट्रीय कुलगुरु सम्मेलन में गूंजी भारतीय ज्ञान परंपरा की आवाज, आचार्य श्री सुनीलसागरजी ने शिक्षा में ज्ञान-संस्कार और सद्विचार को बताया भविष्य की नींव*
इंदौर।
नेमी नगर जैन कॉलोनी स्थित घूंघट गार्डन में रविवार, 4 अक्टूबर को कुंदकुंद ज्ञानपीठ एवं सेंटर फॉर जैन स्टडीज, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के संयुक्त आयोजन में राष्ट्रीय कुलगुरु सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का मुख्य विषय “भारतीय ज्ञान परंपरा : विविध आयाम” रहा। कार्यक्रम में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलगुरु, शिक्षाविद् एवं विद्वान शामिल हुए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सांसद श्री शंकर लालवानीजी रहे। सम्मेलन में पावन सान्निध्य प्रखर अभ्रंश संत, प्राकृताचार्य एवं चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महामुनिराज का रहा।
कार्यक्रम में प्रो. सिद्धार्थ जी सिंह कुलगुरु नव नालंदा नालंदा, प्रो. राजेश जी वर्मा सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलगुरु एवं शिक्षाविदों का सम्मान किया गया। इनमें प्रो. आलोक जी चौबे, प्रो. शिवशंकर मिश्रा, प्रो. मोहन जी, प्रो. वी.के. जैन सहित अनेक विद्वान प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। सम्मेलन के दौरान ‘अर्हत वचन’ पत्रिका का विमोचन तथा प्राकृत शिक्षण-शिक्षा शिविर से संबंधित सामग्री का भी विमोचन किया गया।

आचार्य श्री सुनीलसागरजी ने अपने मार्गदर्शन में कहा कि “शिक्षा में ज्ञान हो, ज्ञान में संस्कार हो, युवाओं के हाथों में कौशल हो और हृदय में सद्विचार हों—ऐसी शिक्षा से ही भविष्य महान बनेगा।” उन्होंने कहा कि युवा केवल सफल ही नहीं, बल्कि समृद्ध और संस्कारित भी बनें, यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान को महान उसकी ऊंची इमारतें या साधन नहीं, बल्कि यहां के मनुष्य का उच्च आचरण, ऊंची भावनाएं और साधना बनाती है। जब मनुष्य भीतर की यात्रा करता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है और “इंसान ही भगवान” बनने की दिशा में आगे बढ़ता है।
आचार्यश्री ने भारतीय ज्ञान परंपरा के प्राचीन स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म, वैदिक संस्कृति और श्रमण संस्कृति भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक धाराओं में शामिल हैं। भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम से इस देश का नाम भारत होने की परंपरा का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। उन्होंने बताया कि भगवान ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी से ब्राह्मी लिपि तथा सुंदरी से अंक एवं गणित की परंपरा जुड़ी हुई है।
उन्होंने प्राकृत भाषा को भारत की प्राचीन और महत्वपूर्ण भाषाई परंपरा बताते हुए कहा कि प्राकृत को प्रकृति की भाषा भी कहा जा सकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा की चर्चा करते हुए उन्होंने षट्खंडागम, समयसार और श्रीभुवलय जैसे ग्रंथों एवं ज्ञान परंपराओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि श्रीभुवलय जैसे अद्भुत ग्रंथ में अंकों के माध्यम से ज्ञान को अभिव्यक्त करने की विलक्षण परंपरा देखने को मिलती है और भारतीय ज्ञान की अनेक धाराएं उसमें समाहित दिखाई देती हैं।
आचार्यश्री ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब भारतीय ज्ञान परंपरा की चर्चा होती है तो अनेक बार चर्चा जैन शास्त्रों तक पहुंच ही नहीं पाती। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा को सामने लाने के लिए पुरातत्व एवं पुरासाहित्य के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि G-20 जैसे वैश्विक मंचों पर जैन धर्म की प्राचीनता को केवल लगभग 2600 वर्ष तक सीमित करके प्रस्तुत करना भारतीय इतिहास और ज्ञान परंपरा के व्यापक स्वरूप को सामने नहीं लाता। वास्तविक तथ्यों और प्राचीन स्रोतों का निष्पक्ष अध्ययन आवश्यक है।
आचार्यश्री ने देश के विश्वविद्यालयों में जैन विद्या विभाग, जैन चेयर तथा प्राकृत अध्ययन को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका की अनेक विश्वविद्यालयों में जैन चेयर स्थापित की गई हैं और वहां के विद्वानों ने जैन दर्शन, अहिंसा एवं शाकाहार के महत्व को समझा है। इसी प्रकार भारत के विश्वविद्यालयों में भी प्राकृत, ब्राह्मी लिपि और जैन अध्ययन को अकादमिक स्तर पर स्थान मिलना चाहिए।
उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि हर विषय को केवल नौकरी के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। “कोई यह न सोचे कि प्राकृत या ब्राह्मी पढ़ने से नौकरी क्या मिलेगी। हर चीज नौकरी के लिए नहीं होती। ज्ञान केवल नौकरी पाने या वेतन प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने के लिए होता है।” उन्होंने कहा कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य मनुष्य को भीतर से समृद्ध, संस्कारित और जागरूक बनाना है।
सम्मेलन में देश के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति एवं कुलगुरुओं की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा, जैन दर्शन, प्राकृत भाषा, ब्राह्मी लिपि, अहिंसा, शाकाहार एवं शिक्षा में संस्कारों की भूमिका जैसे विषयों पर सार्थक विमर्श हुआ। सम्मेलन ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने तथा नई पीढ़ी तक उसके वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक महत्व को पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सांसद श्री शंकरजी लालवानी रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में सी.ए. स्वप्निल जी कोठारी (कुलाधिपति-रेनेसा) उपस्थित रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. राकेश जी सिंघई, कुलगुरु, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय ने की। सम्मेलन के निवेदक श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री अमित कासलीवाल रहे। उनके साथ न्यासीगण सुशील कुमार सिंह कासलीवाल, आदित्य कासलीवाल, लोकेश कासलीवाल एवं डॉ. अनिल कुमार जैन सहित आयोजन से जुड़े पदाधिकारी उपस्थित रहे।
साथ ही देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की ओर से श्री प्रज्वल खरे, रजिस्ट्रार, प्रो. रजनीश जैन, निदेशक (CJS) तथा प्रो. राहुल सिंह, सह-निदेशक (CJS) की सहभागिता रही।
माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





