तप, त्याग एवं तपस्था से संयम पुष्ट होता हैआर्यिका विज्ञाश्री*

धर्म

तप, त्याग एवं तपस्था से संयम पुष्ट होता हैआर्यिका विज्ञाश्री*

निवाई

श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अग्रवाल मंदिर निवाई मे गुरु माँ विज्ञा श्री माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में 25 अक्टूबर 2022को जैन धर्म के 24वें तीर्थकर भगवान महावीर का 2549 वां मोक्ष कल्याणक हर्षोल्लास से मनाया गया। इस अवसर पर आर्यिका श्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संयम ही जीवन है,इस वाक्य से जीवन की सहायता एवं सरलता टपकती है। असंयम मृत्यु के समान है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफल होने के लिए संयम आधार भूत तत्व है, जैसे रेलगाड़ी पटरी पर चलने का संयम रखती हुई गंतव्य स्थान तक सहजता से पहुंचती है ठीक उसी प्रकार जीवन की गाड़ी भी संयम की पटरी पर चलकर जीवन सरिता से पार हो सकती है। संयम की प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यकता है खान-पान का संयम, उठने-बैठने का संयम, बोल-चाल का संयम, दृष्टि का संयम ये सब हमारे जीवन व्यवहार के घटक है, हमारे व्यक्तित्व के घोतक है। तप, त्याग एवं तपस्था से संयम पुष्ट होता है। अगर खान-पान का संयम न हो तो तकलीफ न केवल पेट को होगी अपितु शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित होंगे। अत: जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन, जैसा पीए पानी वैसी होए वाणी का गहरा संबंध है। जैसा भोजन वैसा न्यूरो ट्रांसमीटर और वैसा हो स्राव जैसे स्राव वैसे भाव । अतः उच्च विचार रखने के लिए खान-पान का संयम अति आवश्यक है।

 

 

 

 

खान-पान के साथ-साथ उठना- बैठना, गति-प्रगति, चाल-ढाल भी व्यक्तित्व का घोतक है। इन सभी क्रियाओं प्रत्येक क्रिया के साथ भाव क्रिया को जोड़े तो जागरूकता बढ़ती है। अगर • जीवन में जागरूकता विद्यमान है तो व्यक्ति पल-पल सजगता एवं आनंद‌ का अनुभव करता है।

राजाबाबू गोधा से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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