दुसरो के बुरे में अपना भला ढूंढ रहे है यही हमारे दुखो का कारण है शुद्धसागर महाराज

धर्म

दुसरो के बुरे में अपना भला ढूंढ रहे है यही हमारे दुखो का कारण है शुद्धसागर महाराज

कोटा
पूज्य मुनि 108 श्री शुद्धसागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ रहे है, किंतु आपस मे मन मे ऐसा बैर बांध लेते है कि दूसरों की भलाई में अपनी बुराई ओर दुसरो की बुराई में अपनी भलाई समझने लगते है। मन मे राग द्वेष पाल रहे है। ओर ऐसा करने में भले ही हम अपना धर्म भी छोड़ देते है तो भी खेद नही मनाते। ओर वीतरागी भगवान से भी राग बांध लेते है।

 

जानकारी देते हुए राजकुमार लुहाडिया ने बताया की आज के इस युग मे हम जिनवाणी की प्राथमिकता अपने निजी संसार के कामो के बाद में रखते है तो ऐसे भावों से पढ़ी गई, सुनी गई जिनवाणी मिथ्या हो जाती है।जिनवाणी भी एक विद्या है उसे अपने जीवन मे उतार कर सिद्ध करनी होती है। जब तक हम चारो अनुयोगों को अपने मस्तिष्क में नही बिठायेंगे तब तक हमें जिनवाणी का पूर्ण ज्ञान नही होगा।
हम अपने ग्रहों को शांत करने के लिए कितने उपक्रम करते है टोने टोटके करते है किंतु जो सबसे बड़ा ग्रह है उसे हम ओर अधिक बढ़ा रहे है उस ग्रह का नाम है परिग्रह।जब हमारा परिग्रह ही छूट जाएगा तो सारे ग्रह अपने आप शांत हो जायेगे।

 

हम आज के युग मे अपने हितों को साधने के लिए अज्ञानी को पूज रहे है और अपने भले की उम्मीद कर रहे है किंतु जब हम अज्ञानी के पास जायेगे तो हमे अज्ञान ही मिलेगा हमे कल्याण का मार्ग नही मिलेगा। हमारा शरीर अज्ञानी है ओर हम इसकी सेवा कर रहे है तो हमे अनंत शरीर ही प्राप्त होंगे।किंतु यदि हम शरीर के भीतर की ज्ञानी आत्मा के कल्याण के लिए शरीर की सेवा करेगे तो अपना कल्याण ही करेगे। हमअपना कल्याण तो चाहते है,सिद्ध पद को पाना तो चाहते है किंतु किंचित मात्र भी प्रयास नही करना चाहते, मन से भाव तो भा रहे किंतु शरीर को कष्ट नही दे रहे ऐसे तो ये मन के लड्डू ऐसे ही फूट जायेगे। सिद्धो की राह पर चलना होगा तभी मोक्ष मार्ग प्रशस्त होगा और हमे सिद्धत्व प्राप्त होगा।

इस अवसर पर घाटोल बांसवाड़ा से श्री सुदीप शास्त्री व श्री किरीट गांधी भी उपस्थित रहे।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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