मन से हार गए लोग भविष्य नहीं रचते, इतिहास खोदने बैठ जाते हैं : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी
बोले—जीवन को बोझ नहीं, अवसर समझिए; महावीर, राम, कृष्ण और बुद्ध जीवन को सार्थक कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं?
पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ।
अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने मौन साधना के दौरान अपने लिखित संदेश में जीवन की गहराई को छूने वाली बात कही। उन्होंने कहा कि जो लोग मन से मर जाते हैं या जीवन जीने की हिम्मत हार जाते हैं, उनमें भविष्य रचने की क्षमता समाप्त हो जाती है और फिर वे इतिहास खोदने बैठ जाते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि आज अनेक लोग जीवन को बोझ और भार की तरह ढो रहे हैं। जिस जीवन में आनंद, प्रेम और उत्सव होना चाहिए, वहां मातम जैसा वातावरण दिखाई देता है। जहां फूल खिलने चाहिए, वहां कांटे चुभ रहे हैं और जहां दीप जलने चाहिए, वहां दिल जल रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इसका कसूर किसका है?
उन्होंने प्रेरक सवाल किया—जब महावीर, कृष्ण, राम और बुद्ध अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं, तो हम क्यों नहीं?
जन्म केवल शुरुआत है, जीवन को जानने का अवसर
आचार्यश्री ने कहा कि जन्म ही जीवन नहीं है, बल्कि जन्म जीवन को जानने, पाने और खोने का अवसर है। मृत्यु हमारे एक और अवसर से चूक जाने का इंतजार कर रही है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का मूल्य समझना चाहिए और उसे निरर्थक मानकर नहीं जीना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज का व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में उलझकर पूछता रहता है—मैं क्या करूं? कैसे जीऊं? मुझे किसी भी काम में सफलता क्यों नहीं मिलती? जबकि आवश्यकता अपने जीवन और दिनचर्या को ईमानदारी से देखने की है।
दिन-रात की भागदौड़ आखिर किसके लिए?
आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि यदि व्यक्ति अपने दिन के पूरे क्रम को देखे तो उसे पता चलेगा कि उसकी अधिकांश भागदौड़ धन-संपत्ति और सांसारिक आकर्षणों के पीछे है। मनुष्य इन्हीं उपलब्धियों में सुख तलाशता रहता है, लेकिन वास्तविक तृप्ति फिर भी नहीं मिलती।
उन्होंने जीवन की इच्छाओं और भौतिक आकर्षणों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि इतिहास उठाकर देख लीजिए, आज तक कोई भी व्यक्ति केवल सांसारिक भोगों से स्थायी रूप से तृप्त नहीं हुआ। जिन्होंने वास्तविक तृप्ति का मार्ग खोज लिया, वे महापुरुष बने या वैराग्य और संन्यास की राह पर चल पड़े।
संसार को जीतना आसान, मन को जीतना कठिन
आचार्यश्री ने संदेश में कहा कि संसार के करोड़ों देवी-देवताओं की पूजा करना आसान हो सकता है, लेकिन सांसारिक संबंधों में रहते हुए स्वयं प्रसन्न रहना और दूसरों को प्रसन्न रखना अत्यंत कठिन है।
उन्होंने इसे बेहद मार्मिक उपमा देते हुए कहा कि सांसारिक आकर्षणों के बीच संतुलन बनाकर सुखी रहना ऐसा है, जैसे शेर की मूंछ के बाल को ताबीज में भरकर पहनना।
आचार्यश्री का यह मौन संदेश केवल सांसारिक जीवन की आलोचना नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं के भीतर झांकने का निमंत्रण है। संदेश स्पष्ट है—जीवन से हार मत मानिए। बीते हुए कल को खोदने के बजाय आने वाले कल को रचने का साहस कीजिए।
प्रचार-प्रसार संयोजक : नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी





