वंश नहीं, संस्कारों की परंपरा आगे बढ़ाइए, तभी पीढ़ियां याद रखेंगी : स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन।
संतान और वंश को आगे बढ़ाना ही मनुष्य के जीवन की वास्तविक पहचान नहीं है। व्यक्ति की सच्ची पहचान उसके उन सत्कर्मों, विचारों और संस्कारों से बनती है, जो उसके जीवन के बाद भी समाज और आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा देते रहें। यदि जीवन को सार्थक बनाना है तो केवल वंश नहीं, बल्कि धर्म, संस्कार और सदाचार की परंपरा आगे बढ़ानी चाहिए।
यह प्रेरक संदेश आर्यिका रत्न स्वस्तिभूषण माताजी ने शनिवार को केशवरायपाटन के अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन के दौरान दिया।
भगवान महावीर ने वंश नहीं, विचारों की परंपरा को अमर किया
स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि सामान्य परिवारों में वंश को आगे बढ़ाने की चिंता स्वाभाविक रूप से रहती है। पुत्र-पुत्री के माध्यम से परिवार की परंपरा आगे बढ़े, ऐसी इच्छा हर व्यक्ति रखता है। लेकिन जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल यह नहीं कि हमारे बाद हमारा परिवार चलता रहे, बल्कि यह है कि हमारे विचार, संस्कार और अच्छे कर्म भी आने वाली पीढ़ियों के जीवन का मार्ग बनें।
उन्होंने भगवान महावीर का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान महावीर ने सांसारिक वंश परंपरा को आगे बढ़ाने की चिंता नहीं की। उन्होंने विवाह नहीं किया, लेकिन उनके अहिंसा, सत्य, संयम और आत्मकल्याण के संदेश की परंपरा आज हजारों वर्षों बाद भी पूरी दुनिया में आगे बढ़ रही है। लाखों श्रद्धालु भगवान महावीर का स्मरण करते हैं, उनके सिद्धांतों को जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं और उनके बताए मार्ग पर चलकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
संतान से बड़ी विरासत हैं अच्छे संस्कार
माताजी ने कहा कि यदि वास्तव में अपनी परंपरा को आगे बढ़ाना है तो उसे केवल परिवार और संतान तक सीमित नहीं रखना चाहिए। बच्चों को धन-संपत्ति से अधिक अच्छे संस्कारों की विरासत दें। धर्म, संयम, सदाचार, करुणा और मानवता के संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुंचेंगे तो वही परिवार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
उन्होंने कहा कि धर्म और संस्कारों से जुड़ा व्यक्ति स्वयं दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है। ऐसे व्यक्ति के अच्छे विचार और सत्कर्म उसके जीवन के बाद भी लोगों को प्रेरित करते रहते हैं। इसलिए अपनी पहचान केवल परिवार और वंश तक सीमित नहीं रखें, बल्कि ऐसे कार्य करें कि आने वाली पीढ़ियां भी आपके जीवन को याद करें।
जैसी संगत, वैसी ही बनती है जीवन की रंगत
आर्यिका रत्न स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि मनुष्य के जीवन पर संगति और संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसी संगत होती है, वैसी ही रंगत होती है। इसलिए बच्चों और युवाओं को ऐसी संगति और वातावरण देना चाहिए, जिसमें धर्म, संस्कृति, साहित्य और सदाचार के संस्कार विकसित हों।
उन्होंने कहा कि संसार में असंख्य मनुष्यों ने जन्म लिया और मृत्यु को प्राप्त हो गए, लेकिन इतिहास उन्हीं महापुरुषों को याद रखता है, जिन्होंने अपने आत्मकल्याण के साथ दूसरों के जीवन को भी कल्याणकारी दिशा दी।
2625 वर्ष बाद भी दुनिया भगवान महावीर को कर रही याद
माताजी ने कहा कि भगवान महावीर के जन्म को लगभग 2625 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी श्रद्धालु उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं। उनके बाद हुए केवली, श्रुतकेवली और महान आचार्यों की वाणी तथा उनके द्वारा रचित साहित्य आज भी समाज को धर्म और आत्मकल्याण का मार्ग दिखा रहा है।
उन्होंने कहा कि यही वास्तविक विरासत है—ऐसे विचार छोड़ जाना जो समय के साथ समाप्त न हों, बल्कि हर पीढ़ी को जीवन जीने की नई दिशा देते रहें।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312







