सच्चे को स्वीकार करना आसान, गलत मान्यताओं को छोड़ना सबसे कठिन : मुनिश्री सुधासागर महाराज
आत्मा पर अनादिकाल से जमा मिथ्यात्व का कब्जा हटाना ही सबसे कठिन साधना; बोले—धर्म का असली प्रश्न यह है कि हमने भीतर से क्या छोड़ा
इन्दौर।
सच्चाई को स्वीकार करना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन वर्षों से मन में जमी गलत मान्यताओं और मिथ्यात्व को छोड़ना अत्यंत कठिन होता है। मोक्षमार्ग में सबसे बड़ा बाधक बाहरी संसार नहीं, बल्कि आत्मा पर अनादिकाल से जमा हुआ मिथ्यात्व है। हमारी भ्रमित मान्यताएं ही हमें धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने से रोकती हैं।
यह गहन आध्यात्मिक संदेश दलाल बाग मैदान, इन्दौर में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत, राजकीय अतिथि, निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागरजी महाराज ने दिया।
मुनिश्री ने आत्मा और मिथ्यात्व के संबंध को सरल उदाहरण से समझाते हुए कहा कि मकान बनाना सरल है, लेकिन यदि किसी शक्तिशाली व्यक्ति ने उस पर कब्जा कर लिया हो तो कब्जा हटाना बेहद कठिन हो जाता है। इसी प्रकार आत्मा हमारी है, लेकिन मिथ्यात्व ने आत्मा पर अनादिकाल से कब्जा कर रखा है। इस कब्जे को हटाना ही साधक के लिए सबसे कठिन साधना है।
सच्चे को स्वीकार करना आसान, गलत को छोड़ना कठिन
मुनिश्री ने कहा कि सच्चे को स्वीकार करना आसान है, लेकिन गलत को छोड़ना कठिन है। साधक को एक समय यह निर्णय लेना ही पड़ता है कि वह सत्य के साथ खड़ा होगा या पुरानी गलत धारणाओं को पकड़े रहेगा। जब सत्य की अनुभूति होने लगे तो गलत मान्यताओं के प्रति भीतर से मोह समाप्त होना चाहिए। यही सम्यक दर्शन की दिशा में बढ़ने का मार्ग है।
दुखों से परेशान होकर संसार छोड़ना वास्तविक वैराग्य नहीं
मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने वैराग्य की वास्तविकता समझाते हुए कहा कि संसार के दुखों से परेशान होकर सब कुछ छोड़ देना ही वैराग्य नहीं है। यदि व्यापार में नुकसान हो गया, किसी ने धोखा दे दिया या किसी ने अपमान कर दिया और इसके कारण संसार बुरा लगने लगा, तो यह स्थायी वैराग्य नहीं हो सकता।
परिस्थितियां बदलते ही ऐसे भाव भी बदल सकते हैं। वास्तविक वैराग्य बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि संसार की वास्तविकता को समझने से उत्पन्न होता है। सच्चा वैराग्य व्यक्ति के भीतर शांति, विवेक और आत्मचिंतन पैदा करता है। केवल संसार के प्रति निंदा, क्रोध और अशांति को वैराग्य मान लेना वैराग्य की गहराई को नहीं समझना है।
धर्म का असली प्रश्न—हमने भीतर से क्या छोड़ा?
मुनिश्री ने कहा कि धर्म केवल इस बात का नाम नहीं है कि हमने कितनी पूजा की, कितने व्रत किए या कितनी बार मंदिर गए। धर्म का वास्तविक प्रश्न यह है कि हमने अपने भीतर से क्या छोड़ा?
गलत मान्यताओं का त्याग, सत्य को स्वीकार करना और सत्य में स्थिर होना ही आत्मजागरण की दिशा है। जब भीतर का मिथ्यात्व कमजोर होता है और सत्य के प्रति दृढ़ता आती है, तभी साधना जीवन को वास्तविक अर्थ प्रदान करती है।
कल से दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन एवं महिला सम्मेलन
परम पूज्य निर्यापक श्रमण राष्ट्रसंत मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागरजी महाराज ससंघ एवं 18 पिच्छिकाओं के सान्निध्य में 4 एवं 5 अक्टूबर को अखिल भारतीय श्री दिगम्बर जैन महिला महासमिति एवं श्रमण संस्कृति महिला मंडल का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित होगा।
अधिवेशन में देशभर से समाज की प्रमुख महिला प्रतिनिधियों एवं पदाधिकारियों की सहभागिता रहेगी। इस दौरान श्रीमती सुशीला पाटनी, श्रीमती शांता पाटनी (आर.के. मार्बल्स), श्रीमती रजनी काला (मुंबई), श्रीमती शीला डोडिया, डॉ. वंदना जैन (जयपुर), इन्दु गांधी, श्रीमती सुमन दगड़ा (ब्यावर) सहित अनेक प्रमुख जन विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे।
राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान विभिन्न विशेष सत्रों के साथ रोल कॉल, विशाल एवं भव्य शोभायात्रा तथा राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण विषयों पर गहन मंथन किया जाएगा। अधिवेशन को लेकर देशभर से आने वाली महिला प्रतिनिधियों में उत्साह का वातावरण है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312





