संसार मोह माया से विरक्त होकर दीक्षार्थी सरोज जैन गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी से दीक्षा लेगी
जयपुर
यह संसार नश्वर है,यह सभी जानते है लेकिन हर कोई मोह माया मे उलझा है लेकिन बहुत ही कम होते है जो संसार मे रहकर विरक्ति का भाव कर आगे बढ़ जाते एसा ही करने जा रही है सरोज जैन जो गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी से दीक्षा लेगी। यह पहला अवसर जब गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी अपने कर कमलो से दीक्षा देगी। यह दीक्षा गुलाबी नगरी जयपुर मे महावीर जयंती की बेला मे सम्पन्न होगी।
परिचय
यदि हम उनके जीवन पर प्रकाश डाले तो उनका जन्म धार्मिक परिवार मे 15मई 1954 बड़ोत मे माता अंगूरी देवी पिता चेतनलाल जैन की बगिया मे हुआ। इनका जन्म ऐसे परिवार मे जहा धर्म के संस्कार कूट कूट के थे। वहा कभी रात मे खाना नहीं दिया जाता था। जब हमने उनसे जाना तो उन्होने कहा हमे बचपन से बिना मंदिर के दर्शन किये बिना कुछ भी नहीं दिया जाता था। वह कहती मै भाग्यशाली हु जो मुझे मेरी गलती पर कभी मुझे डाटा नहीं गया बल्कि समझाया गया। आपके 3 भाई और एक बहिन है। आपका विवाह धर्मपाल जैन के साथ हुआ उंन्हे जो ससुराल मिला वही भी संस्कारित मिला। आपके पति धर्मपाल जैन वह ससुर नगर के अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर मे अभिषेक किया करते थे। वह कहती है मेने अपने जीवन काल मे कही संतो के आर्यिका माताजी के प्रवचन सुने आहार भी देखा लेकिन आहार नहीं मन मे डर सा था कही कुछ गलत न हो जाए लेकिन बाद मे भय खुलता गया और आगे बढने लगी।
नियम व्रत
आप गृह्स्र्थ अवस्था मे रहते हुए भी धर्म मार्ग पर चलती गयी सन 1988 मे आपने ज्ञानभूषण महाराज से क्षुद्र जल का त्याग लिया, उसके उपरांत 1996 विमल सागर महाराज से चरित्र शुद्धि व्रत को ग्रहण किया। आपको अपने पीहर व ससुराल मे धर्मंमय वातावरण मिला आपके परिणाम निर्मल होते गए मार्च 2005मे आपके पति के निधन होने के बाद समस्त दायित्व निर्वाहन होने के बाद मुक्ति पथ की और अग्रसर होने का भाव बना तभी संयोग बना गणिनी 105 स्वस्तिभूषण माताजी का और उनके पावन सानिध्य का वह इसी कारण आत्मोन्नति के साथ मोक्षमार्ग की और बलवती हुई और आगे चलकर माताजी से प्रतिमा के व्रत को भी ग्रहण किया।
इनकी भावना
वह कहती है मेरी भगवान से वह माताजी से यही प्रार्थना है की मै समाधी से ही जाऊ। सज्जाती गृहस्थ जीवन जितना अच्छा संस्कारित वात्सल्यमय सहिष्णुता से बीता। वह ख़ुशी से झूम, उठी जब 13 मार्च 2022 को माताजी ने दीक्षा की घोषणा की तब ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। और मन आज भी भाव विहल है। मै जीवन मे अपने नियमो की द्रढ़ता से पूर्ण कर समाधी की भावना करती हु।
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी की यह रिपोर्ट
