अपने हितों के साथ दूसरा के हितों का ख्याल रखें वह मनुष्य है प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
अपने हितों के साथ साथ दूसरों के हितों का ख्याल रखे वह मनुष्य है,अपने हितों के लिये दूसरों का अहित करने बाला जानवर तथा दूसरों के हितों के लिये अपने हितों का त्याग कर दे वह देवता कहलाता है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने गुमास्ता नगर दि. जैन मंदिर परिसर में मकर संक्रांति दिवस पर प्रातःप्रवचन सभा में व्यक्त किये।
मुनि श्री ने व्यापार, व्यवहार, खानपान तथा विचारों में सकारात्मकता की बात करते हुये कहा कि आम व्यक्ति धन कमाता है तो वह उस धन को मौज मस्ती में उड़ा देता है वंही एक आध्यात्मिक व्यक्ति अपनी फिजूलखर्ची पर रोक लगाकर अपने धन को परमार्थ में लगाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि एक स्थान पर समाज की गौ शाला के लिये पंच लोग चंदा लैने गये उस व्यक्ती ने उन सभी की अच्छी आवभगत की और उनको बैठाया तथा अपनी धर्मपत्नी को दूध गरम कर अतिथियों को देने का कहा धर्मपत्नी दूध गरम करने के लिये गेंस को जलाने लगी और उसे जलाने में 8-10 माचिस की सींक खराब हो गई तो सेठजी ने अपनी धर्मपत्नी को सबके सामने डांटते हुये कहा कि तुमने एक सींक के स्थान पर आठ दस सींक का नुकसान कर दिया? सेठजी के उक्त व्यवहार से जो लोग चंदा लेने आऐ थे वह सकपकाऐ कि कही उन्होंने गलत स्थान से चंदा की शुरुआत तो नहीं कर दी।

खैर सभी लोगों ने दूध पिया और संकुचाते हुये गौ शाला के लिये सेठजी के सामने कागज रख दिया और उसमें ग्यारह हजार रूपये लिख दिये सेठजी ने कागज को देखा औरअंदर गये तथा पचास पचास हजार की दो गडडीयां लाकर उन्होंने रख दी और कहा कि यह एक लाख रुपये मेरी ओर से इस पुण्य कार्य के लिये है यदि और भी आपको जरुरत महसूस हों तो मुझे बताइयेगा सेठजी के व्यवहार को देख सभी पंच हतप्रभ थे और उन्होंने पूछ ही लिया कि अभी अभी तो आपने एक माचिस की आठ दस काड़ी के लिये अपनी धर्मपत्नी को सबके सामने डांट दिया और दान के लिये हमने आपसे ग्यारह हजार लिखे थे और आपने एक लाख रुपये दे दिये यह बात हमारी कुछ समझ नहीं आई? तो उन्होंने कहा कि “मै फिजूलखर्ची को तो बिल्कुल पसंद नहीं करता और अच्छे कार्य के लिये जो भी सहयोग मेरे से हो सकता है वह में तुरंत देता हूं” तब सभी पंचो ने उनकी भावनाओं को धन्यवाद देते हुये कहा कि “अध्यात्म तो आपके विचारों से ही प्रकट हो रहा है।
जो व्यक्ति अपने संसाधनों का तथा समय का सही उपयोग परमार्थ के लिये करता है वही अपने धन का तथा समय का सही सदुपयोग करता है” मुनि श्री ने कहा कि कोई भी घटना घट जाए तो कभी निमित्तों को दोष मत देना बल्कि अपनी ओर दृष्टि करना शायद मेरे से ही कोई त्रुटि हुई है। उन्होंने कहा कि अपनी सोच को आध्यात्मिक बनाइये यदि आपकी सोच आध्यात्मिक होगी तो छोटी छोटी बातें आपको प्रभावित नहीं करेंगी।

मुनि श्री ने कहा कि दूसरों को धोखा देने वाला व्यक्ती दूसरों को धोखा बाद में देता है सबसे पहले वह स्वं को धोखा देता है जो दूसरों के हितों का ध्यान रखता है वह व्यवहारिक सोच का धनी कहलाता है, मुनि श्री ने व्यवहार के संद्रभ में कहा कि अक्सर देखा जाता है कि जिसके साथ हमारी सोच प्रतिकूल होती है,उनसे हमारा व्यवहार नकारात्मक हो जाता है तथा जिसके साथ सोच अनूकूल है उसके साथ हमारा व्यवहार सकारात्मक रहता है, उन्होंने कहा कि जीने का मजा तो तब है जब हम प्रतिकूल व्यक्तियो के साथ भी अपने व्यवहार को सकारात्मक रखें,जो व्यक्ति धर्माचरण का पालन करता हैं उसके आचरण से ही एक सदी हुई जीवन शैली तथा सकारात्मक विचार झलकते है इसीलिये सदियो से यह बात चली आई है “जैसा खावे अन्न वैसा होगा मन, जैसा पीवे पानी वैसी होगी वाणी” यदि आपका खानपान सात्विक तथा आपकी जीवनशैली सकारात्मक है तो आप हमेशा रख पाएगे, हित मित एवं सात्विक भोजन ग्रहण करने बाला व्यक्ति कभी बीमार नहीं पड़ता, इसीलिये कहा गया है कि एक बार खाने वाला योगी दो बार खाए वह भोगी तथा बार बार खाने वाला रोगी होता है।उन्होंने कहा कि अपनी मानसिकता को बदलो आवश्यक सुविधाओं के साथ जीवन को सकारात्मक बनाओ,
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
