“जब तक हम अपने संस्कारों को मजबूत नहीं करेंगे,तब तक हम एक श्रेष्ठ और सफल भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते” मुनिश्री प्रमाण सागर
(गिरीडीह)
हमारी वास्तविक पहचान हमारी श्रद्धा, संस्कार, अहिंसा और शाकाहार के प्रति समर्पण से है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने उडीसा से आये सराक बंधुओ को संबोधित करते हुये कहा मुनि श्री ने कहा कि “सराक” शब्द “श्रावक” शब्द का ही परिवर्तित रूप है,उन्होने कहा कि सच्चा श्रावक वही है जो जिनेंद्र भगवान के उपदेशों को सुनकर उनके अनुरूप आचरण करता है, सदाचारी, श्रद्धावान, विवेकवान और क्रियावान जीवन जीता है, मुनिश्री ने कहा कि समय के साथ भाषा, वेशभूषा और परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन संस्कार और श्रद्धा नहीं बदलनी चाहिए,आज भी समाज में अहिंसा, शाकाहार, गुरुभक्ति और प्रभुभक्ति के प्रति जो झुकाव दिखाई देता है,वह आपके पूर्वजों से प्राप्त संस्कारों का ही परिणाम है। यही हमारी सबसे बड़ी धरोहर और उपलब्धि है, केवल अतीत का गौरवगान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करना अधिक आवश्यक है।
भविष्य तभी सुरक्षित और समृद्ध बनेगा जब प्रत्येक घर में धर्म, संस्कार और सदाचार का वातावरण होगा,हर बच्चा णमोकार मंत्र का स्मरण करेगा, भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपनाएगा,अहिंसाऔर शाकाहार को अपने जीवन का आदर्श बनाएगा तथा व्यसनमुक्त जीवन जिएगा
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी का धर्म या पहचान बदलना नहीं है,बल्कि समाज को उसकी वास्तविक जड़ों और सांस्कृतिक विरासत का स्मरण कराना है।उन्होंने माताओं को संस्कारों की प्रथम शिक्षिका बताते हुए कहा कि वे केवल बच्चों को जन्म देने वाली नहीं, बल्कि उनके चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली होती हैं। वहीं युवाओं को समाज का भविष्य बताते हुए उन्हें अपनी परंपरा और मूल्यों से जुड़े रहने का आह्वान किया।मुनिश्री ने कहा कि जिस समाज को अपनी परंपरा, संस्कृति, संस्कार और पहचान का ज्ञान नहीं होता, उसकी प्रतिष्ठा और अस्तित्व दोनों संकट में पड़ जाते हैं।
जैसे कोई बच्चा अपने परिवार और घर का पता भूल जाए तो वह भटक जाता है, उसी प्रकार अपनी जड़ों से कट चुका समाज भी दिशाहीन हो जाता है।

उन्होंने “धर्म जागरण संस्कार शिविर” के उद्देश्य को बताते हुए कहा कि इस शिविर में सबसे महत्वपूर्ण बात अपनी पहचान को जानना है।हमें यह समझना होगा कि हम कौन हैं?
हम श्रावक हैं, हम तीर्थंकरों के अनुयायी हैं, और हमारी पहचान अहिंसा, श्रद्धा, सदाचार तथा धर्ममय जीवन से है। इन्हीं मूल्यों को अपनाकर समाज और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल बनाया जा सकता है।

इसलिए सबसे पहले हमें अपने संस्कारों को सुदृढ़ करना चाहिए, अपने धर्म और सदाचार को जीवन में अपनाना चाहिए। जब हमारे संस्कार दृढ़ होंगे, तभी हम अपने उज्ज्वल, सफल और सार्थक भविष्य की नींव रख सकेंगे।”

उपरोक्त जानकारी देते हुये राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया आज से तीन दिवसीय धर्म जागरण संस्कार शिविर का शुभारंभ हुआ जिसमें मुख्य भूमिका जैन संघ पुणे की रही जो कि सराक क्षेत्र में अपना काम कर रहे हैं सेँकडों की संख्या मेँ सराक बंधूओँ ने भाग लिया और अपने वास्तविकता से परिचित हुये!
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
