दुनिया जीतने से बड़ी है अपने क्रोध और लोभ पर जीतः माताजी

धर्म

दुनिया जीतने से बड़ी है अपने क्रोध और लोभ पर विजय पाना: स्वस्तिभूषण माताजी

 

 सिकंदर और जैन मुनिराज का प्रसंग सुनाकर समझाया आत्मविजय का महत्व, अहिंसा और अपरिग्रह का दिया संदेश

 

केशवरायपाटन।

 

दुनिया को जीत लेना बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अपने भीतर छिपे क्रोध, मान, माया और लोभ पर विजय प्राप्त करना उससे भी बड़ी साधना है। सच्चा विजेता वही है, जो दूसरों पर नहीं, बल्कि स्वयं पर शासन करना सीख ले। यह प्रेरक संदेश भारत गौरव गणिनी आर्यिका रत्न 105 स्वस्ति भूषण माताजी ने बुधवार को धर्मसभा में दिया। उन्होंने सिकंदर और एक दिगंबर जैन मुनिराज से जुड़ा प्रेरक प्रसंग सुनाकर आत्मविजय, त्याग और अपरिग्रह का महत्व समझाया।

 

माताजी ने बताया कि विश्व विजय के उद्देश्य से भारत आए सिकंदर को जब दिगंबर जैन संतों के त्याग, तपस्या और वैराग्य के बारे में जानकारी मिली, तो उसके मन में एक जैन मुनिराज से मिलने की जिज्ञासा जागी। उसने अपने मंत्री को मुनिराज के पास भेजा। मंत्री ने मुनिराज से कहा कि सम्राट उनसे मिलना चाहते हैं और बदले में उन्हें सोना, चांदी तथा बहुमूल्य रत्न भेंट किए जाएंगे। लेकिन मुनिराज ने सहज भाव से स्पष्ट कर दिया कि उन्हें न सोने की आवश्यकता है, न चांदी की, न रत्नों की और न ही वस्त्रों की।

 

मुनिराज के इस उत्तर ने मंत्री को आश्चर्यचकित कर दिया। जिस संसार में मनुष्य धन-दौलत, वैभव और सुख-सुविधाओं को पाने के लिए जीवनभर संघर्ष करता है, वहीं एक दिगंबर जैन मुनिराज ने समस्त परिग्रह का त्याग कर दिया था। उनके लिए बाहरी संपत्ति का कोई आकर्षण नहीं था, क्योंकि उन्होंने आत्मकल्याण और आत्मिक संपदा का महत्व समझ लिया था।

 

### संसार पर विजय से बड़ी है आत्मविजय

 

मुनिराज के स्वयं आने से इनकार करने पर सिकंदर उनसे मिलने पहुंचा। उसने मुनिराज के विचार सुने और जैन धर्म के सिद्धांतों को समझा। इस प्रसंग के माध्यम से स्वस्ति भूषण माताजी ने समझाया कि बाहरी दुनिया को जीतने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति यदि अपनी इच्छाओं और कषायों का गुलाम है, तो उसकी विजय अधूरी है।

 

जैन धर्म हमें सिखाता है कि वास्तविक विजय किसी दूसरे को पराजित करने में नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करने में है। क्रोध व्यक्ति की शांति छीन लेता है, मान अहंकार को बढ़ाता है, माया छल-कपट की ओर ले जाती है और लोभ मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं होने देता। इन कषायों पर नियंत्रण ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

 

माताजी के संदेश का सार यही है कि सिकंदर की पहचान उसकी विश्व विजय से बनी, लेकिन जैन मुनिराज का आदर्श त्याग, संयम और आत्मविजय की प्रेरणा देता है। अहिंसा, अपरिग्रह और संयम के सिद्धांत केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को शांत, सरल और सार्थक बनाने का मार्ग हैं।

 

सच्ची सफलता दूसरों को अपने अधीन करने में नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाने में है। जो व्यक्ति अपने क्रोध को शांत कर ले, लोभ को त्याग दे और अहंकार से दूर रहकर जीवन जीना सीख ले, वही वास्तविक अर्थों में विजेता है।

 

संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 📞 9929747312

 

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