प्रथम दर्शन में ही मन को मोह गया वीतरागता का जीवंत सौंदर्य
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के प्रथम दर्शन की अविस्मरणीय अनुभूति, मुनि श्री क्षमासागर महाराज की लेखनी से
एक बार जो उन चरणों में पहुंचा, फिर लौटकर भी कहां लौट पाया…!
जैन धर्म के महान संत, समाधिस्थ परम पूज्य मुनि श्री 108 क्षमासागर जी महाराज द्वारा रचित पुस्तक ‘अमूर्त शिल्पी’ में आचार्य भगवंत श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के प्रथम दर्शन का अत्यंत भावपूर्ण एवं हृदयस्पर्शी वर्णन मिलता है। यह केवल एक संत के प्रथम दर्शन का संस्मरण नहीं, बल्कि वीतरागता के दिव्य सौंदर्य से साक्षात्कार की ऐसी अनुभूति है, जो पाठक के मन को भी श्रद्धा और भक्ति से भर देती है।
मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज अपनी अनुभूति को शब्द देते हुए लिखते हैं—
“मैं उस दिन पहली बार आचार्य महाराज के दर्शन करने कुंडलपुर गया था। आचार्य महाराज एक छोटे-से कमरे में बैठे थे। इतना बड़ा व्यक्तित्व इतने छोटे-से स्थान में समा गया, इस बात ने मुझे चकित कर दिया।
उनके ठीक पीछे खुली हुई एक बड़ी-सी खिड़की थी और उससे झांकता आकाश उस दिन पहली बार मुझे बहुत अच्छा लगा। खिड़की से आई रोशनी में दमकती आचार्य महाराज की निरावृत देह से निरंतर झरते वीतराग सौंदर्य ने मेरा मन मोह लिया।”
आचार्य श्री के उस प्रथम दर्शन की अनुभूति का वर्णन करते हुए मुनि श्री आगे लिखते हैं—
“क्षणभर के लिए वीतरागता के आकर्षण में खो गया और कमरे के बाहर ही ठिठका खड़ा रह गया। फिर लगा कि भीतर जाना चाहिए। दर्शन तो भीतर से ही संभव है। बाहर से दर्शन नहीं हो पाते, पर भीतर पहुंचना आसान भी नहीं था। दरवाजे पर भीड़ बहुत थी ही, मैं स्वयं भी भीड़ से घिरा था।
यह सोचकर कि कभी संभव हुआ तो एकांकी होकर आऊंगा, मैं वापस लौट आया। कहने को तो उस दिन मैं वापस लौट आया, लेकिन सचमुच मैं आज तक लौट नहीं पाया। अब तो यही चाहता हूं कि जीवन भर उन चरणों में बना रहूं, वहां से कभी दूर न होऊं।”
मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज के ये शब्द गुरु के प्रति अनन्य श्रद्धा, समर्पण और वीतरागता के प्रति गहरे आकर्षण को अभिव्यक्त करते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का वह प्रथम दर्शन उनके जीवन में ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति बनकर आया, जिसकी स्मृति जीवनभर उनके हृदय में बनी रही।
अपनी अनुभूति का सार व्यक्त करते हुए मुनि श्री लिखते हैं—
“उनके दर्शन करके मुझे वीतरागता के जीवंत सौंदर्य की जो अनुभूति हुई है, वह सदा बनी रहे, यही मेरे प्रथम दर्शन की उपलब्धि है।”
ये पंक्तियां हमें यह समझने की प्रेरणा देती हैं कि संतों का वास्तविक आकर्षण बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि उनके त्याग, तप, संयम, आत्मसाधना और वीतराग भाव में निहित होता है। सच्चे संतों के दर्शन केवल आंखों से नहीं, श्रद्धा और निर्मल भावों से किए जाते हैं। कभी-कभी जीवन का एक क्षण भी ऐसी अमिट छाप छोड़ जाता है, जो जीवनभर आत्मकल्याण की राह दिखाता रहता है।
‘अमूर्त शिल्पी’ में संकलित यह भावपूर्ण संस्मरण गुरु-भक्ति और वीतरागता के उस अद्भुत संबंध को उजागर करता है, जिसमें एक बार मन रम जाए तो फिर वहां से लौटना संभव नहीं रह जाता।





संकलन एवं प्रस्तुति: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 📞 9929747312


