*क्षमा वाणी पर्व मनाया ,मांगी एक दूसरे से क्षमा **
धामनोद//
दिगंबर जैन समाज का पर्व राज पर्यूषण पर्व उत्तम क्षमा पर समाप्त हुए, यह पर्व उत्तम क्षमा धर्म से प्रारंभ हो कर क्षमा वाणी पर समाप्त होता है इस दिन सभी श्रावक श्राविका एक दूसरे से मिल कर गत वर्ष में ही अपने से गलतियों की क्षमा याचना करते है, वैसे जैन धर्म में जिनवाणी ये कहती है कि व्यक्ति ने चौबीस घंटे के अंदर सभी जीवों से क्षमा याचना कर लेना चाहिए क्षमा मांगने से मन ने बैर नहीं रहता और सामने वाले के मन में भी वैर की गठान नहीं रहती साथ ही क्षमा वही मांगता है जो वीर होता है ,जिन शासन में तो कहा भी गया है क्षमा विरस्य भूषणम अर्थात क्षमा मांगना और क्षमा करना वीरो का ही काम है बड़वानी में विराजित परम पूज्य गुरुदेव चतुर्थ पट्टाचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका सुप्रज्ञ मति माताजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आपका क्षेत्र पवित्र है शुद्ध है, सिद्ध है एक तरफ चुलगिरी जहां से इंद्र जीत कुंभ कर्ण आदि साढ़े पांच कोड़ा कौड़ी मुनि मोक्ष गए और एक तरफ पवित्र नर्मदा नदी बह रही है और यदि उसके बाद भी आपने अपने भाव को शुद्ध नहीं करोगे तो आपका क्षेत्र कुछ नहीं कर सकता ।आपको अपने मन में एक दूसरे के प्रति वात्सल्य भाईचारा और क्षमा का भाव रखना होगा और एक दूसरे के प्रति समर्पण दया का भाव रखना होगा तो ही क्षमावाणी पर्व सार्थक होगा ,आप यदि अपने मन से मलिनता दूर नहीं करेंगे तो सारी पूजा उपवास भी व्यर्थ है।
आज समाज जन ने भगवान के अभिषेक और पूज्य माताजी सुप्रज्ञ मति जी के मुखारविन्द से शांति धारा सम्पन्न हुई और एक दूसरे से क्षमा याचना की ओर सभी समाज जन रत्नत्रय की और सोलह कारण जी की माला की बोली वालों को घर पहुंचाने गए और बधाईया दी।
