जीवन में जीवंतता लाने के लिए एवं जीवन को क्रियाशील बनाने के लिए यह रामचंद्र जी का चरित्र निश्चित ही अवश्य ही सुनना चाहिए। धर्म चक्रवर्ती जयकीर्ति जी गुरुदेव
कोटा
राजस्थान विशिष्ट रामकथाकार अनुष्ठान विशेषज्ञ धर्म चक्रवर्ती जयकीर्ति जी गुरुदेव रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान है । विगत 35 सालो से पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार आर के पुरम ने बताया कि गुरुदेव के मुखारविंद दिनांक 21 नवंबर से 30 नवंबर तक अकलंक स्कूल परिसर में भव्य रामकथा संगीत की सुमधुर धुनों के साथ चल रही है। श्रद्धालु भाव विभोर हो झूम उठते है। आज रामकथा का सातवां दिन था। अकलंक संस्थान के अध्यक्ष पीयूष बज सचिव अनिमेष जैन बताया कि मां जिनवाणी को पालकी में विराजमान कर गुरुदेव के कर कमलों में देने का सौभाग्य राजेश – शर्मीला, भावी – विपुल दिनेश पाटनी परिवार जन को मिला ।
महेश जैन गंगवाल ने बताया कि राजा श्रेणिक बनने का अवसर श्री दिनेश कुमार- नीलू ,चिराग-स्वेता, पराग- श्रुति,रक्ष, नेहा, ऐरा,स्वर्ण मड़िया,कनवास वाले, को मिला परम पूज्य गुरुदेव धर्म चक्रवती जय कीर्ति जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो मनुष्य कल्याणकारी वचनों को कहता अथवा सुनता है वास्तव में वहीं मनुष्य है अन्य तो शिल्पकार द्वारा बनाए हुए मनुष्याकार पुतलों के समान है अर्थात जीवन में जीवंतता लाने के लिए एवं जीवन को क्रियाशील बनाने के लिए यह रामचंद्र जी का चरित्र निश्चित ही अवश्य ही सुनना चाहिए।

अमृतसमान – आरोग्य प्रदायी सुगन्धित जल को लाने हेतु हनुमान – भामण्डल एवं अंगद को भेजा जाता है,वे भरतादि के साथ द्रोणमेघ राजा से लक्षमण के जीवन रक्षार्थ विशल्या की याचना करने पर राजा मना करता है किन्तु कैकयी द्वारा समझाने पर वह कन्या को भेजता है, युद्ध भूमि में विशल्या का बहुमान, कन्या के समीप आते ही लक्ष्मण सचेत हो जाते है, सम्पूर्ण सेना के पास अमृतसम जल भेजा जाता है जिससे समी स्वस्थ हो जाते है।

राम द्वारा लक्ष्मण को विशल्या का संपूर्ण वृत्तान्त वर्णन, लक्ष्मण का विशल्या के साथ वैभवपूर्ण विवाहोत्सव, रावण को नीति शास्त्र अनुसार मृगांक आदि मंत्रीयों द्वारा सीता को लौटाने हेतु संबोधन, अष्टाह्निक पर्व में युद्ध विराम करके रावण अपने हजार स्वर्णखंभो – युक्त श्री शांतिनाथ जिनालय में दिव्य द्रव्यों से पूजन आदि करता है एवं बहुरुपिणी विद्या सिद्धि हेतु अचलासन में जाप में स्थित हो जाता है। इधर रावण की विद्या सिद्धि की सूचना सुनकर धर्मयुक्त श्री रामके मना करने पर विद्याधर कुमार लंका में जाकर अनेक तोड फोड एवं उपद्रव करते है रावण की दृढ़ता देख मणिभद्र-पूर्णभद्र देव उपद्रव दूर करते है, लक्ष्मण द्वारा निवेदन करने पर दोनों देव धर्म एवं नीति की रक्षार्थ मात्र रावण को विचलित करने का अनुमति देते है , कुमारों द्वारा अनेकानेक प्रकार से विचलित करने पर भी अटल रावण ने बहुरुपिणी विद्या सिद्ध कर ही ली,रावण द्वारा भय एवं स्नेह से सीता को आकर्षित करने के अनेक प्रयास किये गये, किन्तु रामनिष्ठ सीता अटल रही, रामके प्रति सीता का अदूट प्रेम देखकर रावण को अपनी गलती का एहसास हुआ फिर भी मोही रावण ने सीता की पाने अपनी विनाशकारी – हठ नही छोडी एवं अनेक अपशकुनों को अनदेखा करके युद्ध भूमि में पहुँचा, रावण एवं लक्ष्मण का दस दिन तक बिना हार – जीत के युद्ध चलता है, अन्त में क्रोधित हो रावण लक्ष्मण पर चक्ररत्न चला देता लेकिन चक्र तीन परिक्रमा कर लक्ष्मण के हाथ में आ जाता है लक्ष्मण कहता है – हे! रावण अब भी सीता को लौटाकर अपने राज्य का उपभोग करो किन्तु रावण अपने दुराग्रह को नहीं छोड़ता है, लक्ष्मण का चक्ररत्न रावण के वक्षस्थल को भेद देता है,

त्रिखंडाधिपति रावण जैसै पर्वत दूटकर गिरता है वैसे भूमि पर गिर जाता है, रावण की मृत्यु से विभिषण एवं मंदोदरी आदि समस्त रानियाँ का करुण विलाप सुन कर राम सबको सान्त्वना देते हुए कहते है कि विद्वानों का वैर केवल मरण पर्यंत ही होता है अत: हमारा कोई वैर नहीं है.. राम लक्ष्मण सहित सभी पद्म सरोवर जाकर रावण का दाह संस्कार करते है, इंद्रजीत, मेघवाहन, कुंभकर्ण को भी दाहसंस्कार में लाया जा ते है वे तीनों विचार करते है ।महामोह महादु:ख देनेवाला है राज्य एवं भोगों की आशा में कैसे जीवन का अंत हो जाता है संसार में धर्म ही सार है अतः सुखदायी निर्ग्रंथ पद ही हमारे लिये श्रेय है। इधर दिन के अंतिम प्रहर में 56हजार मुनियों के साथ अनंतवीर्य मुनिराज आकाश मार्ग सें लंका में प्रवेश करते है, रात्री के अंतिम प्रहर में अनंत वीर्य मुनिराज को केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है, देवों द्वारा केवल ज्ञान का महोत्सव मनाया जाता है इंद्रजीत – मेघवाहन – कुंभकरण जिनदीक्षा धारण करते हैं एवं मंदोदरी चंद्रनखा सहित 48 रानियाँ आर्यिका दीक्षा ग्रहण करती है, इधर राम, लक्ष्मण, विभीषण आदि लंका में प्रवेश करते हैं, उन्नत प्रीतियुक्त राम – सीता का मिलन एवं संवाद, राम – सीता का देवताओं द्वारा प्रशंसा एवं बहुमान… आदि कथानकों का अत्यन्त नवरसयुक्त मनमोहक शैली से श्रीरामभक्तों को गुरुदेव ने मंत्र – मुग्ध कर दिया, सम्पूर्ण सभा आनन्द में सराबोर हो गई।
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार
कोटा राजस्थान से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



