पर्वराज पर्युषण का दसवां चरण : उत्तम ब्रह्मचर्य नजर और नियत को संभालना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म : आचार्य प्रसन्न सागरजी

धर्म

पर्वराज पर्युषण का दसवां चरण : उत्तम ब्रह्मचर्य
नजर और नियत को संभालना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म : आचार्य प्रसन्न सागरजी
सोनकच्छ

पर्वों के पर्वराज पर्युषण महापर्व के दसवें चरण उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ में धर्मसभा का आयोजन हुआ।

 

धर्मसभा में गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए व्रत चक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि “स्वयं में रमना, स्वयं में उतरना और स्वयं में खो जाना ही उत्तम ब्रह्मचर्य है।” उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल इंद्रियों पर नियंत्रण रखना नहीं, बल्कि अपनी जीवन-ऊर्जा को सही दिशा में लगाना है।

 

आचार्यश्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य यानी लक्ष्मण रेखा खींचना और ब्रह्म जैसी चर्या करना ही उत्तम ब्रह्मचर्य है। यह कठिन साधना केवल मन को साधने से संभव है। जब मन नियंत्रित होता है, तभी व्यक्ति अपनी चेतना को ऊंचाई की ओर ले जा सकता है। उन्होंने कहा कि चेतना की भूख परमात्मा से मिलाती है, जबकि मन और शरीर की भूख कभी पूर्ण तृप्त नहीं होती।
उन्होंने जीवन की ऊर्जा को सही दिशा देने का संदेश देते हुए कहा—
काम में नहीं, राम में लगाएं।
भोग में नहीं, योग में लगाएं।
संसार में नहीं, साधना में लगाएं।
वासना में नहीं, प्रार्थना में लगाएं।

 

आचार्यश्री ने कहा कि सरकार परिवार नियोजन की चिंता करती है, जबकि धर्म पाप नियोजन की चिंता करता है। मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि उसके जीवन में पाप की वृद्धि किस प्रकार रुके और आत्मकल्याण की दिशा में उसका कदम कैसे आगे बढ़े।
उन्होंने दृष्टि और नियत की शुद्धता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि चश्मा लगने के बाद दूर की चीजें भी स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं। अखबार की खबरें, कागज पर लिखे शब्द, बाजार की दूर-दूर स्थित दुकानें और लोगों के रंग-बिरंगे कपड़े साफ दिखाई देने लगते हैं, लेकिन चश्मा बदलने से केवल बाहरी नजर साफ होती है, मनुष्य की नियत और दृष्टि तभी साफ होती है जब उसके भीतर आत्मचिंतन और संयम जागता है।

 

आचार्यश्री ने कहा कि “नजर और नियत को संभालना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है।” ब्रह्मचर्य व्यक्ति को बाहरी आकर्षणों से ऊपर उठाकर आत्मा की ओर ले जाने वाली साधना है। जब मनुष्य अपनी दृष्टि, विचार और इच्छाओं पर संयम स्थापित करता है, तब उसका जीवन आध्यात्मिक शुद्धता की ओर अग्रसर होता है।
धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के प्रवचन का श्रवण कर उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के संदेश को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया। पुष्पगिरी तीर्थ में पर्युषण महापर्व के अवसर पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्माराधना एवं प्रवचन का लाभ ले रहे हैं।
जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *