मन, वचन और काया में एकरूपता ही सत्य की पहचान : मुनि श्री 108 योगसागर जी एवं मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज

धर्म

🌺 उत्तम सत्य धर्म : असत्य का त्याग कर आत्मा के शाश्वत सत्य को पहचानना ही सच्ची साधना

मन, वचन और काया में एकरूपता ही सत्य की पहचान : मुनि श्री 108 योगसागर जी एवं मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज

सत्य केवल वाणी का विषय नहीं, बल्कि विचारों, व्यवहार और आचरण की निर्मलता का मार्ग है

 

कोटा, 20 सितम्बर। दशलक्षण महापर्व के पंचम दिवस उत्तम सत्य धर्म की आराधना श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज एवं मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने उत्तम सत्य धर्म की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि सत्य केवल बोलने का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की साधना है।

 

 

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में असत्य केवल झूठ बोलने से नहीं आता, बल्कि जब मन में कुछ और, वचन में कुछ और तथा आचरण में कुछ और हो जाता है, तब जीवन में असत्य प्रवेश करता है। उत्तम सत्य धर्म मन, वचन और काया में एकरूपता की प्रेरणा देता है। व्यक्ति जैसा भीतर से है, वैसा ही बाहर से दिखाई दे और उसकी कथनी एवं करनी में अंतर न हो—यही सत्य की वास्तविक साधना है।

क्रोध, मान, माया और लोभ सत्य के मार्ग में प्रमुख बाधक

 

मुनिश्री ने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ मनुष्य को सत्य से दूर करने वाले प्रमुख कारण हैं। भय के कारण बोला गया झूठ, स्वार्थ के कारण छिपाया गया सत्य, लाभ के लिए किया गया छल तथा प्रतिष्ठा बचाने के लिए किया गया कपट—ये सभी आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर ले जाते हैं।

इसलिए सत्य धर्म केवल सत्य बोलने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि उन कारणों को समाप्त करने की प्रेरणा देता है, जिनसे असत्य का जन्म होता है।

 

उन्होंने कहा कि सत्य वही है, जो हितकारी, मर्यादित और विवेकपूर्ण हो। सत्य के नाम पर किसी को आहत करना धर्म नहीं है। सत्य में करुणा, विवेक और आत्मकल्याण की भावना होनी चाहिए। ऐसी वाणी, जो जीवन में शांति, सद्भाव और जागृति उत्पन्न करे, वही धर्ममय वाणी है।

बाहरी संसार परिवर्तनशील, आत्मा का स्वरूप शाश्वत

 

मुनिश्री ने आत्मा के संदर्भ में कहा कि संसार में दिखाई देने वाली अनेक वस्तुएं परिवर्तनशील हैं। शरीर बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, संबंध बदलते हैं तथा धन-संपत्ति आती-जाती रहती है, लेकिन आत्मा का ज्ञाता-दृष्टा स्वरूप शाश्वत है।

इसलिए उत्तम सत्य धर्म का सर्वोच्च उद्देश्य केवल व्यवहार में सत्य बोलना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को पहचानना है। जब जीव पर-पदार्थों और परभावों से भिन्न अपने शुद्ध चेतन स्वरूप को पहचानने का पुरुषार्थ करता है, तब वह सत्य की ओर अग्रसर होता है।

 

उन्होंने कहा कि आज मनुष्य बाहरी दुनिया के सामने अपनी छवि को सही साबित करने में लगा हुआ है, लेकिन उसे अपने भीतर झांकने का अवसर नहीं मिलता। दुनिया से सत्य बोलने से पहले स्वयं से सत्य बोलना आवश्यक है।

 

मनुष्य स्वयं से पूछे—मैं कौन हूं? मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है? क्या मैं शरीर हूं या शरीर का ज्ञाता हूं? क्या सुख बाहरी वस्तुओं में है अथवा आत्मा के भीतर? इन प्रश्नों पर चिंतन करना ही सत्य धर्म की दिशा में पहला कदम है।

 

सत्य को केवल सुनें नहीं, जीवन में उतारें

 

मुनिश्री ने कहा कि झूठ बोलकर प्राप्त किया गया लाभ क्षणिक हो सकता है, लेकिन उसका संस्कार आत्मा पर प्रभाव डालता है। इसके विपरीत सत्य का पालन कभी-कभी कठिन दिखाई दे सकता है, लेकिन वह चरित्र, विश्वास और आत्मबल को मजबूत करता है।

 

धर्मसभा में कहा गया कि सत्य को केवल सुनना नहीं, जीना है। परिवार में सत्य, व्यापार में सत्य, व्यवहार में सत्य, समाज में सत्य और स्वयं के प्रति सत्य—जब जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सत्य का प्रकाश आता है, तब व्यक्ति का चरित्र निर्मल होता है और समाज में विश्वास एवं सद्भाव बढ़ता है।

 

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि दशलक्षण महापर्व के इस पावन अवसर पर केवल एक दिन सत्य धर्म की पूजा न करें, बल्कि झूठ, छल, कपट, दिखावा और स्वार्थपूर्ण व्यवहार को जीवन से कम करने का संकल्प लें। किसी को धोखा देने से पहले स्वयं से पूछें कि क्या यह मेरे आत्मस्वरूप के अनुकूल है।

 

उत्तम सत्य धर्म का संदेश यही है—सत्य केवल हमारी वाणी में नहीं, हमारे विचारों में हो; केवल विचारों में नहीं, हमारे आचरण में हो और अंततः हमें उस शाश्वत सत्य स्वरूप तक पहुंचाए, जो आत्मा का वास्तविक स्वरूप है। यही उत्तम सत्य धर्म की सार्थक आराधना है।

 

🌼 आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर अर्जित किया धर्मलाभ

 

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन सुधा, अकुल, प्रिया, अभिषेक, निशिता, चंबल डेयरी, हुकुमचंद जी, महावीर जी एवं सांवला परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

 

कलश स्थापना का पुण्यार्जन संजय जी, कविता जी, संयम, दिव्यांशा जी, दुगेरिया परिवार; मनोज जी, तारामती जी, अंश जी, वंश जी एवं माडिया परिवार द्वारा किया गया।

 

श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती एवं श्रावक श्रेष्ठी का पुण्यार्जन श्रद्धापूर्वक किया गया।

 

शांतिधारा का पुण्यार्जन

 

श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन निम्न परिवारों द्वारा किया गया—

 

श्री आचार्य विद्यासागर बालक छात्रावास, पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी, कोटा

श्रीमान राजेश जी एवं श्रीमती सोनल जी सेठिया परिवार

श्रीमती विमला जी, श्री धनराज जी एवं श्रीमती आशा जी जेठानिवाल परिवार

श्रीमती सुशीला जी, श्री अशोक जी एवं श्री राजकुमार जी ठौरा परिवार

श्री पराग विघाना टोंग्या परिवार

श्रीमान पदम जी एवं श्री आशीष जी कांसलीवाल परिवार

श्रीमती प्रभा जी, श्री प्रतीक जी एवं श्रीमती रानू जी सुरलाया परिवार

श्री विद्यासागर छात्रावास, दादाबाड़ी–नसियां जी, बांसवाड़ा ग्रुप परिवार

दशलक्षण एवं भक्तामर विधान

 

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित पांच अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया।

 

भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमती किश्कन्धा बाई, जम्बू कुमार जी एवं भानु जी द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

 

तत्त्वार्थ सूत्र का पुण्यार्जन श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ द्वारा किया गया।

 

आहारदान एवं मंगलाचरण

 

श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री देवकरण जी एवं श्रीमती सुलोचना जी, रोपा वाले परिवार को प्राप्त हुआ।

 

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमान कमलेश जी सोगानी को प्राप्त हुआ।

 

ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के अवतरण दिवस के पावन अवसर पर श्रीमान प्रकाश जी एवं श्रीमती इंदिरा जी द्वारा मंगलाचरण का पुण्य अवसर प्राप्त किया गया।

 

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

 

🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश

आज के प्रवचन का सार

 

सत्य केवल वाणी की शुद्धता नहीं, बल्कि मन, वचन और काया की एकरूपता तथा आत्मस्वरूप की पहचान का नाम है।

 

झूठ, छल, कपट, माया और स्वार्थ से दूर रहकर हितकारी, मर्यादित एवं विवेकपूर्ण वाणी का प्रयोग करना चाहिए। बाहरी संसार परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा का ज्ञाता-दृष्टा स्वरूप शाश्वत है।

 

🌿 संदेश

 

“दूसरों से सत्य बोलने से पहले स्वयं से सत्य बोलें। अपने विचारों में सत्य, वाणी में सत्य और आचरण में सत्य उतारकर अपने शाश्वत आत्मस्वरूप की पहचान करना ही उत्तम सत्य धर्म की सच्ची आराधना है।”

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

 

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