सत्य केवल बोलने की बात नहीं, उसे जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है : मुनि प्रमाण सागर महाराज

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सत्य केवल बोलने की बात नहीं, उसे जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है : मुनि प्रमाण सागर महाराज

सत्य के चार सूत्र—देखो, स्वीकारो, बोलो और जियो; परिवार से व्यापार और डिजिटल जीवन तक सत्यनिष्ठा जरूरी

गिरिडीह (श्री सम्मेदशिखरजी)।

दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म की व्याख्या करते हुए राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि सत्य केवल बोलने का विषय नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे उतारने की साधना है। सत्य को जीवन में उतारने के लिए चार सूत्रों को अपनाना आवश्यक है—सत्य को देखो, सत्य को स्वीकारो, सत्य बोलो और सत्य को जियो।

मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर किसी घटना को अपनी दृष्टि और पूर्वाग्रह के आधार पर देखता है और पूरी सच्चाई जाने बिना ही उसके बारे में अपनी कहानी बना लेता है। किसी व्यक्ति के फोन न उठाने को उसका उपेक्षा करना मान लेना इसका उदाहरण है, जबकि वास्तविक कारण कुछ और भी हो सकता है। इसलिए किसी व्यक्ति, घटना या परिस्थिति के संबंध में निर्णय लेने से पहले उसकी पृष्ठभूमि और दूसरे पक्ष को समझना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि कभी-कभी आंखों देखा भी पूरा सत्य नहीं होता और जो दिखाई नहीं दे रहा है, वह असत्य हो, यह भी जरूरी नहीं। सत्य को देखने के लिए व्यापक दृष्टि, धैर्य और निष्पक्ष सोच आवश्यक है।

दूसरों की कमियां देखने से पहले अपने भीतर झांकें

मुनि श्री ने कहा कि दूसरों की कमियां हमें बहुत आसानी से दिखाई देती हैं, लेकिन अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ को स्वीकार करने में मन अनेक तर्क खड़े करता है। उन्होंने दर्पण का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार दर्पण चेहरे की वास्तविकता दिखाता है, उसी प्रकार व्यक्ति को अपने भीतर झांककर अपनी कमियों को पहचानना चाहिए।

अपनी कमियों को स्वीकार करना आत्मग्लानि नहीं, बल्कि आत्मसुधार की पहली सीढ़ी है। जब व्यक्ति अपने भीतर के सत्य को स्वीकार करता है, तभी वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होती है।

साफगोई के नाम पर कठोरता नहीं, सत्य में भी मर्यादा जरूरी

सत्य बोलने की चर्चा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि कुछ लोग यह कहकर कठोर शब्द बोलते हैं कि “मैं तो साफ-साफ बोलता हूं।” लेकिन यदि आपकी स्पष्टवादिता से रिश्तों में कटुता बढ़ रही है तो वह साफगोई नहीं, बल्कि कठोरता है।

उन्होंने कहा कि सत्य को मर्यादा, विनम्रता और प्रियता के साथ बोलना चाहिए। किसी पर आरोप लगाने या आदेश देने के बजाय अनुरोध और सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करना चाहिए। कोई बात सत्य होने पर भी यदि वह अनावश्यक रूप से किसी को पीड़ा पहुंचाती है या उसकी निजी जिंदगी को सार्वजनिक करती है तो ऐसी बात कहने से बचना चाहिए।

जहां बोलने से परिणाम खराब हो वहां मौन और जहां मौन से नुकसान हो वहां बोलना ही विवेक है।

सत्य को जीना है तो विचार, वाणी और व्यवहार में हो एकरूपता

मुनि श्री ने कहा कि सत्य को जीने का अर्थ है कि विचार, वाणी और व्यवहार में एकरूपता दिखाई दे। परिवार में सच्चाई, व्यापार में ईमानदारी और समाज में विश्वसनीयता हमारे जीवन का हिस्सा बननी चाहिए।

उन्होंने कहा कि केवल पैसा कमाना पर्याप्त नहीं है, विश्वास कमाना भी जरूरी है। जितना कर सकें उतना ही वादा करें और जो कहें, उसे पूरा करने का प्रयास करें। व्यापार में किसी की मजबूरी का अनुचित लाभ न उठाएं तथा लालच में आकर ऐसे सौदों में न पड़ें जिनकी वास्तविकता संदिग्ध हो। व्यापार में नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी बनाए रखना आवश्यक है।

डिजिटल युग में भी सत्य की कसौटी पर परखें हर सूचना

मुनि श्री ने डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच सत्य की कसौटी अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि कोई भी संदेश, वीडियो या सूचना प्राप्त होने पर उसे बिना जांचे-परखे आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।

उन्होंने पुराने वीडियो में नई घटनाएं जोड़कर या अशुद्ध सामग्री मिलाकर लोगों को भ्रमित करने वाली सामग्री से सावधान रहने की बात कही। केवल व्यूज बढ़ाने के लिए भ्रामक सामग्री फैलाना समाज के लिए नुकसानदायक है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से संकल्प लेने का आह्वान किया कि जब तक किसी सूचना को पूरी तरह समझ और सत्यापित न कर लें, तब तक उसे फॉरवर्ड नहीं करेंगे। साथ ही लगातार भ्रामक सामग्री भेजने वालों से दूरी बनाना भी जरूरी है।

दुनिया से कनेक्शन बढ़ा, अब खुद से जुड़ने की जरूरत

मुनि श्री ने कहा कि आज मनुष्य डिजिटल माध्यमों से हजारों लोगों से जुड़ा हुआ है, लेकिन स्वयं से उसका संबंध कमजोर होता जा रहा है। इसलिए बाहरी कनेक्शन बढ़ाने के साथ-साथ अपने भीतर से जुड़ना भी जरूरी है।

धर्म क्षेत्र में भी व्यक्ति को जैसा वह वास्तव में है, वैसा ही स्वयं को प्रस्तुत करना चाहिए। बाहर कुछ और दिखाना और भीतर कुछ और होना आस्था को खोखला कर देता है। अपनी सच्चाई को स्वीकार करके जीने पर ही धर्म जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकता है।

दशलक्षण महापर्व के इस क्रम में उत्तम सत्य धर्म का संदेश जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सत्यनिष्ठा, मर्यादा और विश्वसनीयता स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

आत्मपरीक्षण से शुरू होगा वास्तविक परिवर्तन

मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से आत्मपरीक्षण का आह्वान करते हुए कहा कि स्वयं से पूछें—

क्या मैं सत्य को देखने की दृष्टि विकसित कर पाया हूं?

क्या मैं अपने भीतर के सत्य को स्वीकार कर पा रहा हूं?

सत्य बोलते समय कितनी शुद्धता और मर्यादा रखता हूं?

क्या मैं परिवार, व्यापार, समाज और डिजिटल जीवन में सत्य को जी पा रहा हूं?

इन प्रश्नों पर निरंतर चिंतन और आत्ममंथन करने से जीवन में बड़ा परिवर्तन संभव है।

युवाओं के लिए सोमवार से पांच दिवसीय विशेष कार्यक्रम

गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि युवाओं के आग्रह पर सोमवार से पांच दिवसीय विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। शिविर में पधारे सभी युवक-युवतियों को प्रतिदिन दोपहर 2 से 3 बजे तक गुणायतन प्रवचन सभा कक्ष में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त होगा।

उन्होंने सभी श्रावक-श्राविकाओं से संस्कार शिविर की निर्धारित ड्रेस कोड के साथ जुलूस में सादर शामिल होने का आह्वान किया।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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