पर्वों के पर्वराज का पांचवां चरण : उत्तम सत्य दिखावे का जीवन बहुत जी लिया, अब यथार्थ से जुड़कर सत्य का जीवन जीएं” : आचार्य प्रसन्न सागर
सोनकच्छ/पुष्पगिरी तीर्थ।
पर्युषण महापर्व के पर्वराज के पांचवें चरण उत्तम सत्य धर्म के अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ में धर्म और आत्मचिंतन की गूंज सुनाई दी। आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने धर्मसभा में श्रद्धालुओं को सत्य के बाहरी स्वरूप से आगे बढ़कर उसके वास्तविक और अनुभूति-आधारित स्वरूप को समझने का संदेश दिया।
आचार्य श्री ने कहा— “सत्य नहीं होता परिभाषित, रहता मात्र अनुभव गम्य।” सत्य को शब्दों की सीमा में बांधा नहीं जा सकता। जो सत्य है, वह अपने मूल स्वरूप में सहज है और उसे किसी आवरण या दिखावे की आवश्यकता नहीं होती।
उन्होंने कहा कि धरती, आकाश, चांद-तारे, पेड़-पौधे, सागर, सरिता और प्रकृति का प्रत्येक जीव अपने मूल स्वरूप में सत्य को प्रकट करता है। प्रकृति की सहजता ही उसका वास्तविक सौंदर्य है। इसी संदर्भ में उन्होंने दिगंबर जैन संतों की निर्वस्त्र साधना को प्रकृति और सत्य की सहजता से जोड़ते हुए उसके आध्यात्मिक भाव को समझाया।
दिखावे से निकलकर यथार्थ से जुड़ने का संदेश
आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने कहा कि उत्तम सत्य धर्म हमें दिखावे की दुनिया से बाहर निकलकर यथार्थ के साथ जीना सिखाता है।
“दिखावे का जीवन बहुत जी लिया, अब यथार्थ से जुड़ें और सत्य का जीवन जीएं।”
उन्होंने कहा कि आज मनुष्य कल्पनाओं के आकाश में इतना विचरण कर रहा है कि अपने पैरों के नीचे मौजूद धरती के यथार्थ को भूलता जा रहा है। जिस धरती पर मनुष्य जन्म लेता है, चलता है, जीवन जीता है और अंततः इसी धरती में विलीन हो जाता है, उसी की वास्तविकता को समझना आवश्यक है।
कल्पनाओं के आकाश से निकलकर धरती के सत्य में आएं
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य अपने ‘मैं’ को मजबूत करने और अपनी कल्पनाओं को सच मानने में लगा रहता है। यही अहंकार उसे सत्य से दूर करता है। सत्य एक है, जबकि असत्य के रूप अनेक हैं। धर्म सत्य है, अग्नि सत्य है और मृत्यु भी सत्य है।
उन्होंने कहा कि सत्य को स्वीकार करने के लिए बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता आवश्यक है। जब व्यक्ति स्वयं के वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है, तभी उत्तम सत्य धर्म उसके जीवन में उतरता है।
“जो बांध ले, वह सत्य नहीं, सम्प्रदाय है”
आचार्य श्री ने सत्य और सम्प्रदाय के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा—
“जो सत्य मनुष्य को बांध दे, वह सत्य नहीं, सम्प्रदाय है। सम्प्रदाय बांधता है, जबकि सत्य मुक्त करता है।”
उन्होंने कहा कि सत्य मुक्ति का मार्ग है। सत्य से बढ़कर दूसरा कोई मुक्ति-दाता नहीं है। सत्य ही शिव है, सत्य ही सुंदर है और सत्य ही परमात्मा है।
जब शब्द अनावश्यक हों, तब मौन सत्य के करीब ले जाता है
उत्तम सत्य धर्म के मर्म को समझाते हुए आचार्य श्री ने कहा कि सत्य का एक आयाम मौन की साधना भी है। जब शब्द अनावश्यक हो जाएं, तब मौन मनुष्य को सत्य के और निकट ले जाता है। कई बार कम बोलना ही नहीं, बल्कि सही समय पर मौन रहना भी सत्य की साधना बन जाता है।
आधुनिक जीवन में मोबाइल के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा—
“मोबाइल आने के बाद आदमी झूठ बोलने में मास्टरमाइंड बन गया है। मोबाइल रखने का अर्थ है—झूठ बोलने का लाइसेंस।”
आचार्य श्री के प्रेरक प्रवचनों ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को गहन आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया। पर्युषण महापर्व के प्रत्येक चरण की तरह उत्तम सत्य धर्म का यह दिवस भी आत्मशुद्धि, संयम, सहजता और अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान का संदेश लेकर आया।
प्रचार-प्रसार संयोजक : नरेंद्र अजमेरा, पियुष कासलीवा
ल (औरंगाबाद) से प्राप्त जानकारी।


संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

