लोभ को त्यागने से प्रकट होती है आत्मा की पवित्रता : स्वस्तिभूषण माताजी
उत्तम शौच धर्म देता है संग्रह, कषाय और लोभ से मुक्त होने का संदेश
केशवरायपाटन।
पर्युषण महापर्व के आध्यात्मिक वातावरण में अतिशय क्षेत्र में चल रहे आध्यात्मिक शिविर में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने उत्तम शौच धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मन की वास्तविक पवित्रता तभी संभव है, जब मनुष्य लोभ और अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करे।
माताजी ने कहा कि लोभ ऐसा शत्रु है, जो शत्रु के रूप में दिखाई नहीं देता, बल्कि मित्र जैसा प्रतीत होता है। यही कारण है कि मनुष्य वस्तुओं, संबंधों और संग्रह को अपना मानकर उनके पीछे निरंतर दौड़ता रहता है। लेकिन अंततः यही लोभ उसके आत्मिक विकास में बाधक बन जाता है।
उन्होंने कहा कि उत्तम शौच धर्म का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि अंतर्मन की शुचिता और आत्मा की पवित्रता है। ‘शुचि’ शब्द से ही ‘शौच’ शब्द बना है। जब मन कषायों से मुक्त होकर निर्मल होता है, तभी उत्तम शौच धर्म की वास्तविक साधना सार्थक होती है।
माताजी ने कषायों की श्रृंखला को समझाते हुए कहा कि क्रोध गया तो क्षमा प्रकट हुई, मान गया तो मार्दव आया, मायाचारी गई तो आर्जव आया और लोभ गया तो शुचिता का भाव प्रकट हुआ। उन्होंने कहा कि जिसके भीतर अभिमान अधिक होता है, उसके भीतर क्रोध भी अधिक उभरता है। इसी प्रकार लोभ मायाचारी को जन्म देता है और मनुष्य को छल-कपट की ओर ले जाता है।
उन्होंने कहा कि क्रोध दिखाई देता है, लेकिन उसकी जड़ को समझने पर अनेक कषायों के मूल में लोभ की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इसी कारण लोभ को पाप का मूल कारण बताया गया है। मनुष्य जितना अधिक संग्रह और ‘मेरा-तेरा’ के भाव में उलझता है, उतना ही आत्मा की निर्मलता से दूर होता जाता है।
उत्तम शौच धर्म हमें केवल शरीर और परिवेश की स्वच्छता का नहीं, बल्कि विचारों और भावों की निर्मलता का संदेश देता है। यह धर्म मनुष्य को लोभ, संग्रह और कषायों से मुक्त होकर आत्मा की पवित्रता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312






