आत्मकल्याण के लिए निष्कपट स्वभाव जरूरी : स्वस्तिभूषण माताजी

धर्म

आत्मकल्याण के लिए निष्कपट स्वभाव जरूरी : स्वस्तिभूषण माताजी

 

मन, वचन और आचरण में एकरूपता ही उत्तम आर्जव धर्म का स्वरूप

 

केशवरायपाटन।

मन में जो भाव हों, वही वाणी में झलकें और वाणी के अनुरूप ही हमारा आचरण हो—मन, वचन और काय की यही एकरूपता उत्तम आर्जव धर्म का आधार है। जीवन में सरलता, सीधापन और निष्कपटता अपनाकर ही व्यक्ति आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

 

अतिशय क्षेत्र में चल रहे दशलक्षण महापर्व के दौरान आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि मन, वचन और काया में सरलता एवं निष्कपटता रखना ही आर्जव धर्म है। आर्जव धर्म मायाचारी के अभाव का नाम है। जीवन में छल, कपट और ठगी को चालाकी समझना उचित नहीं है। छल से संसार में कुछ समय के लिए लाभ दिखाई दे सकता है, लेकिन धर्म के मार्ग पर कपट की कोई जगह नहीं है। आत्मकल्याण के लिए सरल और निष्कपट स्वभाव को अपनाना आवश्यक है, क्योंकि सरलता ही जीवन का वास्तविक आभूषण है।

 

दर्पण की तरह हो मन, वचन और आचरण

 

दर्पण का उदाहरण देते हुए माताजी ने कहा कि जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण के सामने चेहरा जैसा होता है, उसका प्रतिबिंब भी वैसा ही दिखाई देता है, उसी प्रकार मनुष्य के मन, वचन और काया में भी समानता होनी चाहिए। भीतर कुछ और और बाहर कुछ और रखना ही मायाचारी है।

 

उन्होंने कहा कि कपट की प्रीति अंगारे के समान होती है। ऊपर से शांत दिखाई देने वाला अंगारा भीतर अग्नि समेटे रहता है और अंततः स्वयं को ही जला देता है। इसी प्रकार कपट और छल का परिणाम भी अंततः व्यक्ति को स्वयं ही भोगना पड़ता है।

 

दूसरे को ठगने से पहले खुद से पूछें—कहीं स्वयं को तो नहीं ठग रहे?

 

माताजी ने कहा कि लक्ष्मी की प्राप्ति पुण्य-पाप के उदय के अनुसार होती है, लेकिन छल करने वाले के अशुभ परिणाम उसके कर्मबंध का कारण बनते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार बिल्ली पीछे आने वाली विपत्ति की चिंता किए बिना दूध पीती रहती है, उसी प्रकार कपट करने वाला व्यक्ति भी अपने कर्मबंध की चिंता किए बिना ठगी करता रहता है।

 

सामने वाला व्यक्ति ठगा जाएगा या नहीं, यह उसके कर्मोदय पर निर्भर हो सकता है, लेकिन छल करने वाले के परिणाम और कर्मबंध उसके अपने होते हैं। इसलिए किसी को ठगने या छल करने से पहले मनुष्य को एक बार स्वयं से प्रश्न करना चाहिए—“कहीं हम दूसरों को ठगने के प्रयास में अपने ही आत्मस्वरूप को तो नहीं ठग रहे?”

 

माताजी के इस संदेश ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के साथ जीवन में सरलता, सत्यता और निष्कपटता अपनाने की प्रेरणा दी।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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