अपकार करने वाले का भी उपकार करना ही आर्जव धर्म का भाव : आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज

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अपकार करने वाले का भी उपकार करना ही आर्जव धर्म का भाव : आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज

 

छल-कपट और मायाचार छोड़कर मन-वचन-काय में सरलता लाने का दिया संदेश

 

बड़ौत।

दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ के सान्निध्य में धर्माराधना, भक्ति और आत्मचिंतन का वातावरण बना हुआ है। महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की आराधना करते हुए आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को जीवन में सरलता, सहजता और निष्कपटता अपनाने का संदेश दिया।

 

आचार्य श्री ने मंगल प्रवचन में कहा कि वीतराग भगवान का ध्यान मन की निर्मलता का कारण बनता है। आर्जव का अर्थ है—ऋजुता अर्थात सरलता का भाव। जहां मन, वचन और कर्म में किसी प्रकार की टेढ़ापन, छल, कपट या मायाचार नहीं होता, वहीं उत्तम आर्जव धर्म प्रकट होता है।

उन्होंने कहा कि माया का अभाव ही आर्जव धर्म है। चार कषायों के क्रमशः क्षय से चार उत्तम धर्म प्रकट होते हैं। माया कषाय के विमोचन से आर्जव धर्म की अनुभूति होती है। यह धर्म केवल पर्व के कुछ दिनों तक सीमित न रहे, बल्कि 24 घंटे हमारे हृदय में सरलता और निष्कपटता का भाव बना रहना चाहिए।

 

आचार्य श्री ने कहा कि मन, वचन और काया की क्रियाएं निरंतर चलती रहती हैं। यही क्रियाएं हमें उत्तम आर्जव धर्म की ओर ले जा सकती हैं, बशर्ते उनमें सरलता और सहजता हो। मन में किसी को गुमराह करने का भाव न हो, वाणी में छल-कपट न हो और कर्मों में बेईमानी न हो—यही आर्जव धर्म की साधना है।

 

मन की बात कर्मों से झलकती है

 

आचार्य श्री ने कहा कि हमारी क्रियाओं से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे मन में क्या चल रहा है। इसलिए तीनों योगों—मन, वचन और काय—में अवक्रता अर्थात सरलता अपनाना आवश्यक है।

 

जो व्यक्ति वक्र चिंतन नहीं करता, वक्र वचन नहीं बोलता और वक्रता से कर्म नहीं करता, उसके जीवन में आर्जव धर्म प्रकट होता है। साथ ही व्यक्ति को अपने दोषों को छिपाना नहीं चाहिए। भगवान और गुरु के समक्ष अपने दोषों को स्वीकार कर उनकी आलोचना करना आत्मशुद्धि का मार्ग है।

 

उन्होंने कहा कि गुरु के सामने अपने मन की बात खुलकर रखनी चाहिए, कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए। गुरु द्वारा दिया गया प्रायश्चित व्यक्ति को अपने दोषों और पापों के परिणामों से बचने का मार्ग दिखाता है तथा आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ाता है।

 

ख्याति और मान के पीछे रिश्तों को न ठुकराएं

 

आचार्य श्री ने कहा कि आज मनुष्य ख्याति, लाभ, पूजा और मान-सम्मान के पीछे इतना दौड़ रहा है कि कई बार अपने ही लोगों को ठुकरा देता है। यह स्थिति क्यों आती है? इसके पीछे हमारी श्रद्धा में कमी भी एक कारण हो सकती है।

 

उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे श्रद्धा दृढ़ होती जाती है, वैसे-वैसे व्यक्ति भगवान के स्वरूप को समझने लगता है और देव, शास्त्र एवं गुरु के प्रति विश्वास मजबूत होता जाता है।

 

दूसरों के दुख पर अपने सुख की इमारत न खड़ी करें

 

आचार्य श्री ने मायाचार से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि दूसरों को धोखा देकर या छल-कपट करके प्राप्त किया गया सुख वास्तविक सुख नहीं हो सकता। अपने सुख के लिए दूसरों के दुख की उपेक्षा करना बहुत बड़ी भूल है और यह आर्जव धर्म के विपरीत है।

 

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन में कभी किसी को धोखा न दें, किसी के साथ छल-कपट न करें और मन-वचन-काय को सरल बनाकर स्व और पर के हित की भावना से कार्य करें।

 

आचार्य श्री ने कहा कि हमें अपकार करने वाले का भी उपकार ही करना चाहिए। यही धर्म की उच्च भावना है और यही जीवन को वास्तविक अर्थों में निर्मल एवं सरल बनाती है।

 

इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के मंगल प्रवचन का लाभ लिया और उत्तम आर्जव धर्म को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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