कुटिलता छोड़ सरलता अपनाना ही उत्तम आर्जव धर्म : आचार्य श्री सुनीलसागर जी
गुरुदेव के पावन सान्निध्य में भक्तिभाव से मनाया गया दशधर्म महापर्व का तृतीय दिवस, साधना और स्वाध्याय से गूंजा इंदौर
इंदौर।
दशधर्म महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की आराधना आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी गुरुदेव के पावन सान्निध्य में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ की गई। दिनभर चले धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं ने आर्जव धर्म के मर्म को समझते हुए आत्मचिंतन किया और जीवन से छल-कपट एवं कुटिलता को दूर कर सरलता और निष्कपटता अपनाने का संकल्प लिया।
प्रातःकालीन मंगल बेला में अध्यात्म योग (अझ्झप जोगं) का आयोजन हुआ। इसके पश्चात आचार्य श्री सुनीलसागर जी गुरुदेव का मंगल प्रवचन हुआ। उन्होंने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मन, वचन और कर्म में एकरूपता तथा हृदय में निष्कपटता ही आर्जव धर्म का स्वरूप है। जब व्यक्ति कुटिल भावों का त्याग कर निर्मल हृदय से व्यवहार करता है, तब उसके जीवन में आर्जव धर्म प्रकट होता है।

“सरल मन ही धर्म की सच्ची भूमि”
गुरुदेव ने कहा कि आर्जव धर्म को धारण करने के लिए मन की सरलता और निर्मलता आवश्यक है। जिसने क्रोध का त्याग कर क्षमा को अपनाया और अभिमान को छोड़कर मार्दव को जीवन में उतारा, वही आगे चलकर सरलता एवं आर्जव की साधना कर सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म केवल बाहरी पूजा-पाठ या आचरण तक सीमित नहीं है। मन के भीतर छिपी कुटिलता, छल और कपट को पहचानकर उन्हें दूर करना ही वास्तविक धर्म-साधना है। जब भीतर और बाहर का अंतर मिट जाता है, तब जीवन में सहजता, सरलता और आत्मिक शांति का अनुभव होने लगता है।
स्वाध्याय, शंका-समाधान और आरती से भक्तिमय हुआ वातावरण
मंगल प्रवचन के पश्चात दिनभर विभिन्न धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय एवं अलग-अलग कक्षाओं का आयोजन हुआ। साधकों और श्रद्धालुओं ने धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के माध्यम से धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझने का प्रयास किया।
सायंकालीन बेला में शंका-समाधान कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसमें श्रद्धालुओं ने धर्म एवं आध्यात्मिक जीवन से जुड़े प्रश्न रखे, जिनका समाधान गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्राप्त किया। इसके पश्चात गुरुदेव की मंगलमय आरती हुई। आरती के बाद विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने वातावरण को भक्तिमय और उत्साहपूर्ण बना दिया।
इस प्रकार दशधर्म महापर्व का तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म—सरलता, निष्कपटता, निर्मलता और मन-वचन-कर्म की एकरूपता का संदेश देते हुए श्रद्धा, साधना और भक्ति के साथ संपन्न हुआ।
माही जैन धीरावत, पीपलखूंट (प्रतापगढ़) से प्राप्त जानकारी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 99297 47312







