संपत्ति उत्तराधिकारी को मिलती है, संस्कार पीढ़ियों तक चलते हैं : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
धर्म की असली परीक्षा मंदिर में नहीं, घर और व्यवहार में होती है—वाणी में सत्य, हित और मर्यादा जरूरी
मधुबन।
धर्म केवल मंदिर में की जाने वाली पूजा-पाठ की क्रिया नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, वाणी और पारिवारिक जीवन में दिखाई देने वाला संस्कार है। “मेरा धर्म मंदिर से मेरे घर तक पहुंचना चाहिए”—यह बात राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही।
मुनि श्री ने कहा कि बोलने का ढंग और लहजा भी धर्म की कसौटी है। दो दिन बाद सत्य धर्म की आराधना होगी, लेकिन सत्य के नाम पर किसी को घायल करना या अपमानित करना धर्म नहीं हो सकता। सत्य वही सार्थक है, जो हितकारी और मर्यादित ढंग से कहा जाए।
उन्होंने कहा कि कई लोग कहते हैं—“मैं तो साफ बोलता हूं, मन में कुछ नहीं रखता, जो मुंह में आया कह दिया।” लेकिन यह साफगोई नहीं, बल्कि वाणी में असंयम है। वाणी में सत्य, हित और मर्यादा के संस्कार आवश्यक हैं। कुछ भी बोलने से पहले व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि जो मैं कह रहा हूं, वह सत्य है या नहीं, हितकारी है या नहीं और उसे किस ढंग से कहा जाना चाहिए।
लहजा बदलिए, रिश्तों में बदलाव अपने आप दिखेगा
मुनि श्री ने कहा कि शब्दों से ज्यादा कई बार उनका लहजा रिश्तों को प्रभावित करता है।
“तुम कभी मेरी बात नहीं सुनते” कहने के बजाय “इस विषय में मेरी बात भी एक बार पूरी सुन लीजिए” कहा जा सकता है। इसी प्रकार “तुम्हें मेरी कोई परवाह नहीं” के स्थान पर “इस समय मुझे आपके सहयोग की अपेक्षा है” कहना अधिक प्रभावी है।
उन्होंने कहा कि आरोप के स्थान पर अनुरोध और कटुता के स्थान पर सकारात्मक अभिव्यक्ति परिवार में संस्कारों की नींव मजबूत करती है।
व्यक्ति नहीं, समस्या पर करें बात
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति पर आक्रमण करने के बजाय समस्या पर बात करनी चाहिए। व्यक्ति को लक्ष्य बनाने से वह भीतर से उग्र होता है, जबकि समस्या पर चर्चा करने से समाधान का रास्ता खुलता है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक जीवन की वास्तविक परीक्षा मंदिर से बाहर निकलने के बाद शुरू होती है। भगवान और गुरु के सामने विनय रखना पर्याप्त नहीं है, वही विनय परिवार, बच्चों और कर्मचारियों के साथ व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। धर्म स्थान के अनुसार बदलना नहीं चाहिए। मंदिर में जो संयम और विनय है, वही घर में भी दिखाई दे—तभी धर्म जीवन का हिस्सा बनेगा।
अगली पीढ़ी के लिए धन से बड़ी विरासत हैं संस्कार
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री ने जीवन के उत्तरार्ध पर चर्चा करते हुए कहा कि एक समय ऐसा भी आता है, जब व्यक्ति को अनावश्यक नियंत्रण, पुरानी शिकायतें, क्रोध और संतानों से अत्यधिक अपेक्षाएं छोड़ने की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि दायित्व पूरा करें, जरूरत पड़ने पर सहयोग करें, लेकिन अगली पीढ़ी को उसके ढंग से जीवन जीने का अवसर भी दें।
मुनि श्री ने कहा कि अगली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी विरासत धन-संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कार हैं।
“संपत्ति उत्तराधिकारी को मिलती है और संस्कार पीढ़ियों तक चलते हैं।”
उन्होंने साधकों से आत्ममंथन करने का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं से पूछे—मेरे जाने के बाद परिवार मुझे किस गुण के लिए याद करेगा? और मेरी कौन-सी आदत ऐसी है, जिसे मैं नहीं चाहता कि अगली पीढ़ी मुझसे सीखे?
चार खानों में छिपा आत्ममंथन का रास्ता
प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने साधकों को कागज पर चार खाने बनाकर आत्ममंथन का अभ्यास कराया। इनमें प्रमुख रूप से—“मुझे क्या छोड़ना है” और “मुझे क्या सुधारना है” जैसे बिंदुओं पर स्वयं का मूल्यांकन करने को कहा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अभ्यास दूसरों को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को देखने और जीवन में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत करने के लिए है।
मुनि श्री के संदेश ने साधकों को यह चिंतन दिया कि धर्म केवल पूजा और अनुष्ठान तक सीमित न रहे, बल्कि हमारी वाणी, व्यवहार, परिवार और संस्कारों में भी दिखाई दे—यही धर्म की वास्तविक सार्थकता है।
जानकारी : अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 99297 47312








