जिस चीज से पकड़ बनती है, वहीं से अकड़ शुरू होती है : स्वस्तिभूषण माताजी

धर्म

जिस चीज से पकड़ बनती है, वहीं से अकड़ शुरू होती है : स्वस्तिभूषण माताजी

 

धन, पद और प्रतिष्ठा को अपना मानने की पकड़ ही बनती है अहंकार का कारण — विनम्रता में ही छिपी है सच्ची महानता

 

केशवरायपाटन।

दशलक्षण महापर्व के आध्यात्मिक वातावरण में अतिशय क्षेत्र में चल रहे अध्यात्म साधना शिविर में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने उत्तम मार्दव धर्म की गहन व्याख्या करते हुए कहा कि “जिस चीज से पकड़ बनती है, वहीं से अकड़ शुरू होती है।” उन्होंने कहा कि जहां पकड़ होती है, वहां अकड़ जन्म लेती है और जहां अकड़ बढ़ती है, वहां व्यक्ति के जीवन में उखड़ने की स्थिति पैदा हो जाती है।

 

माताजी ने कहा कि मनुष्य धन, परिवार, पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति को अपना मानकर उनसे मोह की पकड़ बना लेता है। यही पकड़ धीरे-धीरे अहंकार और मान कषाय का रूप धारण कर लेती है। व्यक्ति के पास जैसे-जैसे उपलब्धियां बढ़ती हैं, वैसे-वैसे यदि विनम्रता नहीं बढ़ती तो उसके व्यवहार में अकड़ दिखाई देने लगती है।

 

उन्होंने समझाया कि कठोरता का विचार जब वचनों में प्रवेश करता है तो अभिमान का रूप ले लेता है। जिस प्रकार पानी जमने पर कठोर हो जाता है, उसी प्रकार मन में कठोरता आने पर व्यक्ति के व्यवहार में अकड़ दिखाई देने लगती है। रावण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसने धन, परिवार और वैभव को अपना मानकर उन पर अधिकार की भावना रखी और अंततः यही अहंकार उसके पतन का कारण बना।

आठ प्रकार के मद से बचने की प्रेरणा

 

स्वस्तिभूषण माताजी ने शास्त्रों में वर्णित आठ प्रकार के मद का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को ज्ञान, पूजा-प्रतिष्ठा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि अर्थात धन-वैभव, तप और शरीर के रूप-सौंदर्य का अहंकार नहीं करना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि ज्ञान मिले तो विनम्रता बढ़नी चाहिए, सम्मान मिले तो सेवा की भावना जागनी चाहिए और धन मिले तो उसका सदुपयोग होना चाहिए। उपलब्धियां मनुष्य को बड़ा बनाने के लिए नहीं, बल्कि उसके भीतर की जिम्मेदारी और विनय को बढ़ाने के लिए होती हैं।

 

माताजी ने कहा कि सच्ची महानता स्वयं को बड़ा समझने में नहीं, बल्कि विनम्र बनने में है। उत्तम मार्दव धर्म व्यक्ति को मान-कषाय का त्याग कर सरलता, नम्रता और सहजता अपनाने की प्रेरणा देता है। जब उपलब्धियों के साथ अहंकार नहीं, बल्कि विनय का भाव जुड़ता है, तभी जीवन की साधना सार्थक होती है और आत्मा निर्मलता की ओर आगे बढ़ती है।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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