पर्वराज पर्युषण का तीसरा चरण : उत्तम आर्जव
माया, छल-कपट और कुटिलता छोड़ सरल एवं निष्कपट जीवन अपनाने का संदेश — अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी
पुष्पगिरी तीर्थ। पर्वों के पर्वराज पर्युषण महापर्व के तीसरे चरण ‘उत्तम आर्जव धर्म’ के अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ में धर्म, साधना और आत्मचिंतन का वातावरण बना हुआ है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु आत्मशुद्धि और धर्माराधना में जुटे हुए हैं।
श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि उत्तम आर्जव धर्म का मूल संदेश है—माया, छल और कपट से मुक्त होकर सरल एवं निष्कपट जीवन जीना। जिस जीवन में कुटिलता और छल-कपट का भाव बना रहता है, वहां वास्तविक धर्म की स्थापना नहीं हो सकती।
कथनी और करनी में अंतर न हो
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपने व्यवहार में एकरूपता लानी चाहिए। कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। परिस्थितियों और स्वार्थ के अनुसार अपना रूप, विचार अथवा व्यवहार बदलते रहना आर्जव धर्म के विपरीत है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में सरलता तभी आती है, जब उसका मन और व्यवहार दोनों निष्कपट हों।
उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि कुछ लोग परिस्थितियों के अनुसार अपना पक्ष बदलते रहते हैं। ऐसे व्यवहार में न स्थिरता होती है और न ही सरलता। उत्तम आर्जव धर्म व्यक्ति को भीतर और बाहर से एक समान बनने की प्रेरणा देता है।
पंथ नहीं, आत्मशुद्धि है धर्म का मूल
आचार्यश्री ने कहा कि पंथ और संप्रदाय धर्म का मूल स्वरूप नहीं हैं, बल्कि धर्म तक पहुंचने के बाहरी माध्यम हैं। धर्म का मूल तत्व आत्मा की शुद्धता और भीतर की चेतना-ज्योति है। इसलिए धर्म के नाम पर होने वाले छल-कपट, स्वार्थ और आपसी खींचतान से सावधान रहने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि धर्म और धर्मगुरुओं के नाम पर किसी भी प्रकार की राजनीति अथवा स्वार्थपूर्ण गतिविधियां धर्म की मूल भावना को कमजोर करती हैं। धर्म का उद्देश्य मनुष्य के भीतर सरलता, विनम्रता, आत्मशुद्धि और करुणा का विकास करना है। यदि धर्म के नाम पर भी मन में कुटिलता बनी रहे तो बाहरी धार्मिक क्रियाएं अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाती हैं।
प्रतिष्ठा दिखावे से नहीं, चरित्र से बनती है
आचार्यश्री ने कहा कि पहले समाज में गलत कार्यों के प्रति झिझक और शर्म का भाव दिखाई देता था, लेकिन आज कई स्थानों पर बदनामी और लोकलाज का भय कम होता दिखाई दे रहा है। मनुष्य को यह समझना होगा कि प्रतिष्ठा बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि आचरण और चरित्र से बनती है।
उन्होंने कहा कि धर्म, ध्यान, पूजा-पाठ, सेवा और भक्ति तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ मन की सरलता और निष्कपटता जुड़ी हो। यदि मन में छल-कपट और स्वार्थ बना रहे तो केवल बाहरी धार्मिक क्रियाएं करना हाथी के स्नान के समान हो सकता है।
पर्युषण बने आत्मनिरीक्षण का पर्व
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि पर्युषण महापर्व को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का अवसर बनाएं। अपने भीतर छिपी माया, कपट, अहंकार और कुटिलता को पहचानें तथा उन्हें दूर करने का सतत प्रयास करें।
उन्होंने कहा कि सरल मन, निष्कपट व्यवहार और शुद्ध भाव ही उत्तम आर्जव धर्म की वास्तविक साधना है। जब मनुष्य भीतर से सरल होता है, तभी उसके जीवन में धर्म का वास्तविक प्रकाश प्रकट होता है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गुरु भक्तों एवं श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर धर्मलाभ लिया।
जानकारी : नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल, प्रचार-प्रसार संयोजक, औरंगाबासंकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 99297 47312








