उत्तम मार्दव धर्म: झुकने में ही महानता सुधासागर महाराज
“अग्नि परीक्षा से गुजरकर ही माटी मंगल कलश बनती है, उसी तरह अहंकार की अग्नि से निकलकर मार्दव प्रकट होता है” — मुनिपुंगव सुधासागर महाराज
इंदौर।
पर्युषण महापर्व के अंतर्गत उत्तम मार्दव धर्म की आराधना के अवसर पर इंदौर का दलालबाग मैदान आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया। देशभर से पहुंचे हजारों श्रावक-श्राविकाओं के लिए महानगर इंदौर इन दिनों साधना और तपस्या की स्थली बन गया है। विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मुनिपुंगव श्री सुधासागर महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म का मर्म समझाते हुए कहा कि “जिसे ऊंचा उठना है, उसे झुकना सीखना होगा और जिसे सबसे आगे चलना है, उसे सबसे पीछे चलने की कला सीखनी होगी।”
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मिट्टी अग्नि की परीक्षा से गुजरकर मंगल कलश का रूप धारण करती है, उसी प्रकार मनुष्य जब अपने अहंकार, मान और श्रेष्ठता के भाव को त्यागकर विनम्रता अपनाता है, तभी उसके भीतर मार्दव धर्म प्रकट होता है।

स्वाभिमान की आड़ में अभिमान न पालें
मुनिश्री ने कहा कि स्वाभिमान आवश्यक है, लेकिन उसकी आड़ में अभिमान को स्थान नहीं मिलना चाहिए। शांति और धर्म की रक्षा के लिए झुकना पड़े तो उसे कमजोरी नहीं, बल्कि महानता समझना चाहिए।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रसंग का उदाहरण देते हुए कहा कि नारायण जैसे पद पर विराजमान श्रीकृष्ण भी शांति के लिए दुर्योधन के सामने दूत बनकर जाने को तैयार हुए। उन्होंने बताया कि शांति और धर्म की स्थापना के लिए यदि व्यक्ति को अपमान भी सहना पड़े और झुकना पड़े, तो वह झुकना ही मार्दव धर्म का श्रेष्ठ उदाहरण बन जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि अक्सर व्यक्ति अपने से कमजोर व्यक्ति पर क्रोध करता है। लेकिन वास्तविक शक्ति तो उस समय दिखाई देती है, जब व्यक्ति अपने अहंकार पर विजय प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि यदि शांति स्थापित करने के लिए किसी परिस्थिति में अपनी बात तक पीछे रखनी पड़े, तो शांति को प्राथमिकता देना ही मार्दव की भावना है।
अहंकार त्यागकर विनम्रता और आत्मचिंतन की ओर बढ़ें
शिविर में मौजूद हजारों श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए मुनिश्री सुधासागर महाराज ने कहा कि मार्दव का अर्थ केवल विनम्र शब्दों का प्रयोग करना नहीं है, बल्कि मन से अहंकार, मान और श्रेष्ठता के भाव को समाप्त करना है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जितना बड़ा बनता जाता है, उसके भीतर उतनी ही विनम्रता आनी चाहिए। फल से लदा हुआ वृक्ष सदैव झुकता है, जबकि खाली वृक्ष अकड़ा हुआ खड़ा रहता है। यही प्रकृति हमें सिखाती है कि वास्तविक महानता के साथ विनम्रता स्वतः आती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्ममंथन करते हुए सवाल किया—हम जीवन में सम्मान चाहते हैं, लेकिन क्या हम दूसरों को सम्मान देने के लिए तैयार हैं? हम चाहते हैं कि लोग हमारी बात सुनें, लेकिन क्या हमारे भीतर दूसरों की बात सुनने की विनम्रता है?
मुनिश्री ने कहा कि यही उत्तम मार्दव धर्म हमें अपने भीतर झांकने और अपने व्यवहार में विनय लाने की शिक्षा देता है। जहां अहंकार होता है, वहां रिश्ते कमजोर पड़ते हैं और जहां विनम्रता होती है, वहां प्रेम, आत्मीयता और शांति का जन्म होता है।
गुरु, माता-पिता और गुणवानों के सामने झुकना सीखें
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में सबसे पहले गुरु के सामने झुकना सीखिए, फिर माता-पिता के सामने, गुणवानों के सामने और अंततः अपने भीतर बैठे अहंकार को झुकाइए। जो व्यक्ति झुकना सीख जाता है, वही वास्तव में ऊंचा उठने के योग्य बनता है।
उन्होंने कहा कि भगवान बनने की यात्रा अहंकार से नहीं, बल्कि विनय से शुरू होती है। उत्तम मार्दव धर्म व्यक्ति को यह सिखाता है कि सम्मान पद से नहीं, गुणों से प्राप्त होता है और नेतृत्व अहंकार से नहीं, बल्कि सेवा एवं संस्कारों से सार्थक होता है।
मार्दव धर्म से परिवार और समाज में बढ़ेगा प्रेम
धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब इस बात का प्रमाण रहा कि आध्यात्मिक संदेश आज भी समाज को नई दिशा देने की शक्ति रखता है। उत्तम मार्दव धर्म ऐसे समाज की प्रेरणा देता है, जहां पद से नहीं, विनय से सम्मान मिले; धन से नहीं, गुणों से पहचान बने और अहंकार से नहीं, सेवा व संस्कारों से नेतृत्व हो।
श्रावक-श्राविकाओं ने संकल्प लिया कि वे अपने पद, धन, विद्या और प्रतिष्ठा का अहंकार नहीं करेंगे, गुणवानों का सम्मान करेंगे, स्वयं विनम्र बनने का प्रयास करेंगे तथा अपने व्यवहार से परिवार और समाज में प्रेम, एकता और संस्कारों को बढ़ावा देंगे।
“झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि महानता की पहचान है।”
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312








