मान चाहना अहंकार बढ़ाता है, मान देना सम्मान बढ़ाता है : मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज
उत्तम मार्दव धर्म पर बोले मुनिश्री—‘रे मानव! निज को पहचान, क्यों करता है तू अभिमान’; उपलब्धियां बढ़ें तो विनय भी बढ़नी चाहिए
मधुबन।
दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिवस उत्तम मार्दव धर्म की आराधना श्रद्धा और आध्यात्मिक भावों के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनिश्री 108 प्रमाण सागर महाराज द्वारा रचित ‘प्रमाण पूजांजलि’ के माध्यम से पंचमेरु, सोलहकारण एवं दशलक्षण धर्म की पूजन संपन्न की गई। इन पूजनों में मुनिश्री के आत्मचिंतन, विनम्रता तथा मान-अभिमान से मुक्ति का संदेश स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होता है।
उत्तम मार्दव धर्म की विवेचना करते हुए मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा—
“रे मानव! निज को पहचान, क्यों करता है तू अभिमान, इक दिन सब छूट जायेगा।”
उन्होंने कहा कि मनुष्य जब स्वयं को पहचानने के बजाय बाहरी उपलब्धियों को अपनी पहचान बना लेता है, तभी अहंकार जन्म लेता है। मुनिश्री ने कहा—
“ऊंचा बनने की अभिलाषा, मन में मान जगाती है,
अपनी महिमा के मद में फिर, दृष्टि कहां रह पाती है।
मार्दव आकर यही सिखाता, मान का भार उतार,
झुकने में ही सहज बड़प्पन, विनय हृदय स्वीकार।”

मुनिश्री ने कहा कि उत्तम मार्दव का भाव व्यक्ति को ‘मैं बड़ा हूं’ की भावना से बाहर निकालकर आत्मा की अनुभूति की ओर ले जाता है। धन, रूप, ज्ञान, कुल, पद, अधिकार और यश मिलने पर मनुष्य सहज ही स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। यही मान धीरे-धीरे व्यवहार में कठोरता और संबंधों में दूरी का कारण बन जाता है। मार्दव धर्म इन बाहरी उपलब्धियों के प्रति अहंकार छोड़कर व्यक्ति को सरल, सहज और विनम्र बनने की प्रेरणा देता है।
फल से लदा वृक्ष झुकता है, वैसे ही गुण बढ़ें तो विनय बढ़े
मुनिश्री ने कहा कि वास्तविक बड़प्पन दूसरों से ऊपर उठने में नहीं, बल्कि विनयपूर्वक झुकने में है। जिस प्रकार फल से लदा हुआ वृक्ष झुक जाता है, उसी प्रकार ज्ञान, गुण और उपलब्धियां बढ़ने के साथ व्यक्ति के भीतर विनय भी बढ़नी चाहिए।
दशलक्षण महापर्व में उत्तम मार्दव का चिंतन स्वयं के भीतर झांकने का अवसर है। व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसके भीतर किस बात का अभिमान है—धन का, परिवार का, ज्ञान का, पद का, रूप का अथवा अपनी धार्मिकता का? इन सभी बाहरी पहचानों के पीछे स्थित आत्मस्वरूप को पहचानना ही मार्दव की दिशा में पहला कदम है।
क्रोध की जड़ में भी छिपा होता है मान
मुनिश्री ने कहा कि क्रोध की जड़ में प्रायः मान छिपा होता है। जब कोई हमारी बात नहीं मानता, हमें महत्व नहीं देता या हमारी आलोचना करता है, तो हमारे मान को चोट पहुंचती है और क्रोध जन्म लेता है। इसलिए क्रोध को केवल दबाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके मूल कारण—मान—को पहचानकर उसे गलाना आवश्यक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मान का संबंध उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन उपलब्धियों के प्रति हमारी मानसिक मान्यता से है। धन, ज्ञान, शक्ति, रूप, पद, प्रतिष्ठा, तप या धर्म अपने आप में अहंकार के कारण नहीं हैं। समस्या तब शुरू होती है, जब व्यक्ति इन्हें अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण मानने लगता है।
धन हो तो उदारता का माध्यम बने, ज्ञान हो तो लोककल्याण का साधन बने, शक्ति हो तो सेवा में लगे और संसाधन हों तो उनका उपयोग दूसरों के हित में हो।
बड़ा कौन और छोटा कौन? असली प्रश्न है—मैं स्वयं को क्या मानता हूं
मुनिश्री ने कहा कि यह जरूरी नहीं कि मान केवल बड़े लोगों में ही होता है। कोई व्यक्ति बड़ी उपलब्धियों के बावजूद अत्यंत विनम्र हो सकता है, जबकि सामान्य स्थिति वाला व्यक्ति भी भीतर से अत्यधिक मानी हो सकता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि मैं बड़ा हूं या छोटा, बल्कि यह है कि मैं स्वयं को क्या मानता हूं।
‘मैं ज्ञानी हूं’, ‘मैं धनी हूं’, ‘मैं प्रतिष्ठित हूं’ जैसी पहचानों के साथ जब श्रेष्ठता का भाव जुड़ जाता है, तभी मान अहंकार का रूप लेता है।
मुनिश्री ने आत्मज्ञान की ओर संकेत करते हुए कहा कि अज्ञान से मान पैदा होता है और ज्ञान मान को नष्ट करता है। शरीर, रूप, धन, पद और प्रतिष्ठा परिवर्तनशील हैं, फिर भी मनुष्य इन्हीं को अपना वास्तविक स्वरूप मानकर जीवन जीता है। आत्मबोध होने पर समझ आता है कि ये सभी क्षणिक संयोग हैं और वास्तविक पहचान आत्मा की है।
इसलिए न स्वयं को बड़ा मानें और न ही अपने आपको हीन समझें, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप का चिंतन करें।
‘मान हो, मद न हो’—यही मार्दव की साधना
मुनिश्री ने कहा कि मानी व्यक्ति स्वयं को पूर्ण समझकर दूसरों से सीखना बंद कर देता है, जबकि विनम्र व्यक्ति हर किसी से कुछ न कुछ ग्रहण करने का भाव रखता है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव में परमात्मा बनने की क्षमता है। इसलिए किसी को स्थायी रूप से बड़ा या छोटा मानना उचित नहीं।
उन्होंने कहा कि जीवन में ‘मैं, मेरा और मुझे’ के स्थान पर ‘हम, हमारा और तुझे’ का भाव विकसित किया जाए तो मान का मर्दन हो सकता है। स्वयं को ही सब कुछ मानना अज्ञान है, जबकि दूसरों के महत्व और गुणों को स्वीकार करना विनम्रता की पहचान है।
मुनिश्री का संदेश रहा—“मान हो, मद न हो।” उपलब्धियां रहें, लेकिन उनके प्रति आसक्ति और गर्व न हो। गुण रहें, लेकिन उनका अहंकार न हो। धर्म और तप भी तभी सार्थक हैं, जब वे व्यक्ति को भीतर से विनम्र बनाएं।
मान मांगना नहीं, मान देना सीखें
मुनिश्री ने कहा कि मान चाहना और मान देना—दोनों में बड़ा अंतर है। मान की अपेक्षा व्यक्ति को भीतर से असंतुष्ट करती है, जबकि दूसरों को सम्मान देना व्यक्तित्व को ऊंचा बनाता है।
इसलिए जीवन में संकल्प होना चाहिए कि हमें मान मांगना नहीं, मान देना है और किसी के सम्मान में कमी नहीं रहने देनी है।
उत्तम मार्दव धर्म का वास्तविक अभ्यास यही है कि उपलब्धियां हों, पर अभिमान न हो; गुण हों, पर गर्व न हो; पहचान हो, पर दूसरों का तिरस्कार न हो। अपने भीतर उतरकर मान को पहचानना, आत्मस्वरूप का भान करना और प्रत्येक जीव के प्रति सम्मान का भाव रखना ही वह साधना है, जो जीवन की दिशा बदल सकती है।
अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिवस उ
त्तम आर्जव धर्म की पूजन संपन्न की जाएगी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312








