णमोकार मंत्र की साधना से अहंकार का हिमालय भी पिघल सकता है : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी
पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म का संदेश—“जहां णमोकार है, वहां अहंकार नहीं”
सोनकच्छ।
पर्वों के पर्वराज पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ में धर्म, साधना और आत्मचिंतन का अनुपम वातावरण बना हुआ है। उत्तम मार्दव धर्म के अवसर पर अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को अहंकार त्यागकर विनय, नम्रता और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
प्रातःकाल गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने उत्तम मार्दव धर्म की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि “णमोकार मंत्र का उपासक अहंकार कैसे कर सकता है? क्योंकि जहां णमोकार है, वहां अहंकार नहीं और जहां अहम है, वहां अर्हम् नहीं।”
उन्होंने कहा कि णमोकार और अहंकार एक-दूसरे के विपरीत हैं। णमोकार पूरब है तो अहंकार पश्चिम, णमोकार उत्तर है तो अहंकार दक्षिण। दोनों का एक साथ रहना संभव नहीं है। जीवन में जितनी विनय और नम्रता बढ़ेगी, उतना ही अहंकार स्वतः कम होता जाएगा।
पांच बार ‘णमो’ में छिपा है विनय का संदेश
आचार्य श्री ने कहा कि णमोकार मंत्र में पांच बार ‘णमो’ शब्द आता है। यह केवल उच्चारण नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक संदेश है। मनुष्य के भीतर अहंकार अनेक सूक्ष्म और जटिल रूपों में छिपा रहता है। बार-बार नमन करने की भावना उस अहंकार को चोट पहुंचाती है और व्यक्ति के भीतर विनय का विकास करती है।
उन्होंने कहा, “णमोकार मंत्र की फुहार से अहंकार का हिमालय भी पिघल सकता है। अहंकार का पिघलना, गलना और मिटना ही उत्तम मार्दव धर्म है।”
ज्ञान, धन और प्रतिष्ठा से नहीं, विनय से आता है सच्चा बड़प्पन
आचार्य श्री ने अहंकार को मनुष्य के आध्यात्मिक विकास की बड़ी बाधा बताते हुए कहा कि व्यक्ति कितना ही ज्ञानवान, धनवान अथवा प्रतिष्ठित क्यों न हो, यदि उसके भीतर अहंकार है तो उसकी विनम्रता और आत्मिक सुंदरता अधूरी है।
उन्होंने कहा कि सच्चा बड़प्पन स्वयं को दूसरों से बड़ा साबित करने में नहीं, बल्कि स्वयं को विनम्र बनाए रखने में है। विनय व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है, जबकि अहंकार उसे भीतर से खोखला करता है।
अपेक्षाएं कम होंगी तो शिकायतें भी कम होंगी
अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि अहंकार से मुक्ति का एक सरल उपाय है—णमोकार मंत्र का अंतःकरण से जाप और अनावश्यक अपेक्षाओं का त्याग। जब व्यक्ति अपनों से अपेक्षाएं कम करता है तो शिकायतें भी कम होने लगती हैं और मन में शांति एवं प्रसन्नता का विस्तार होता है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य वास्तव में नमन करना सीख जाता है, तब उसके चेहरे पर सहजता और आचरण में निखार दिखाई देने लगता है। विनय आत्मा को हल्का करती है और अहंकार जीवन को बोझिल बना देता है।
आत्मचिंतन और अहंकार त्याग का लिया संकल्प
आचार्य श्री के प्रेरणादायी प्रवचन से उपस्थित गुरु भक्तों ने उत्तम मार्दव धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने, आत्मचिंतन करने और अहंकार का त्याग करने का संकल्प लिया। पुष्पगिरी तीर्थ परिसर में णमोकार मंत्र के जाप और धार्मिक आयोजनों से वातावरण श्रद्धा एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा।
— नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल, प्रचार-प्रसार संयोजक, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312







