क्रोध पर विजय ही सच्ची क्षमा, मन की गांठ खोलकर जीवन में उतारें शांति : आचार्य पुलक सागर महाराज
दशलक्षण महापर्व का शुभारंभ, पहले दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
भीलवाड़ा।
शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में बुधवार से दशलक्षण (पर्युषण) महापर्व की आध्यात्मिक आराधना का शुभारंभ हुआ। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज द्वारा आयोजित दस दिवसीय धार्मिक शिविर में पहली बार भीलवाड़ा में चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री 108 पुलक सागर महाराज का सानिध्य श्रद्धालुओं को प्राप्त हो रहा है। महापर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की भावपूर्ण पूजा-अर्चना की गई।
अभिषेक में दिखा आस्था का अद्भुत संगम
प्रथम दिवस भगवान पार्श्वनाथ के अभिषेक के दौरान श्रद्धा और भक्ति का विशेष दृश्य देखने को मिला। चक्रवर्ती एवं इन्द्र का स्वरूप धारण कर बड़ी संख्या में श्रावक अभिषेक के लिए पहुंचे। श्रद्धालु कतारबद्ध होकर भगवान का अभिषेक एवं पूजन-अर्चन करते नजर आए।
आयोजन स्थल पर ऐसा भक्तिमय वातावरण बना कि श्रद्धालुओं को सुमेरु पर्वत पर इन्द्रों द्वारा भगवान के अभिषेक किए जाने का भाव अनुभव हुआ। आराधना के दौरान श्रद्धालु भक्ति में नृत्य करते हुए झूम उठे। वहीं पार्श्वनाथ प्रभु की भक्ति में गरबा नृत्य ने भी वातावरण को और भक्तिमय बना दिया।
“क्रोध का अभाव ही क्षमा धर्म है”
आचार्य श्री 108 पुलक सागर महाराज ने उत्तम क्षमा धर्म की महत्ता बताते हुए कहा कि “क्रोध का अभाव ही क्षमा धर्म है।” उन्होंने कहा कि जब क्रोध करने की परिस्थिति सामने हो और व्यक्ति फिर भी क्रोध न करे, वहीं से उसके भीतर क्षमा का प्राकट्य होता है।
उन्होंने कहा कि क्षमा केवल किसी की गलती को सहन कर लेने का नाम नहीं, बल्कि मन को शांत करने और भीतर जमा द्वेष की गांठ खोलने का नाम है। क्षमा ऐसा आभूषण है, जो व्यक्ति को शत्रु और मित्र दोनों के प्रति सहिष्णुता एवं सद्भाव रखना सिखाता है।
क्रोध को दबाना नहीं, निष्फल करना सीखें
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन का लक्ष्य ऐसा होना चाहिए कि मन में क्रोध उत्पन्न ही न हो। यदि किसी परिस्थिति में क्रोध आ भी जाए तो नम्रता और विवेक के माध्यम से उसे निष्फल कर देना चाहिए। क्रोध पर नियंत्रण का श्रेष्ठ मार्ग क्षमा धर्म की आराधना है।
उन्होंने कहा कि उत्तम क्षमा की साधना केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रहे, बल्कि उसका प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार और जीवन में दिखाई देना चाहिए। सहनशीलता का विकास, द्वेष का त्याग और प्रत्येक जीव के प्रति क्षमाभाव ही इस धर्म की वास्तविक साधना है।
दशलक्षण महापर्व का संदेश यही है कि हम बाहर की दुनिया को बदलने से पहले अपने भीतर जमा क्रोध, अहंकार, द्वेष और कटुता को पहचानें। मन की गांठ खुलेगी तो रिश्तों में मिठास आएगी और जीवन में शांति का मार्ग प्रशस्त होगा।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312






