अन्याय के आगे सिर झुकाना क्षमा नहीं, मन से द्वेष मिटाना ही उत्तम क्षमा : मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज

धर्म

अन्याय के आगे सिर झुकाना क्षमा नहीं, मन से द्वेष मिटाना ही उत्तम क्षमा : मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज

 

“अपराध के प्रति कठोरता हो सकती है, लेकिन व्यक्ति के प्रति घृणा नहीं; वचन कठोर हो सकते हैं, हृदय कठोर नहीं होना चाहिए”

 

मधुबन।

क्षमा का अर्थ अन्याय और अत्याचार को चुपचाप सहन करना नहीं, बल्कि आवश्यक कदम उठाने के बाद भी मन में द्वेष, प्रतिशोध और कड़वाहट को स्थान न देना है। मन से द्वेष मिटाना ही उत्तम क्षमा है और व्यवहार में आवश्यक दूरी बनाए रखना विवेक है। यह भावपूर्ण संदेश गुणायतन प्रणेता मुनिश्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने क्षमा धर्म पर आयोजित शंकासमाधान कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को दिया।

 

 

 

मुनिश्री ने कहा कि जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जब कोई हमारे साथ गलत व्यवहार करता है, आर्थिक नुकसान पहुंचाता है या हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। ऐसी स्थिति में विवेकपूर्वक अपने अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है। यदि किसी ने व्यापार में पैसा हड़प लिया है तो पैसा वापस मांगना, सावधानी बरतना अथवा आवश्यकता पड़ने पर सामाजिक या कानूनी स्तर पर कार्रवाई करना गलत नहीं है।

 

उन्होंने स्पष्ट किया कि क्षमा का अर्थ स्वयं को बार-बार नुकसान के लिए प्रस्तुत करते रहना नहीं है। कार्रवाई के बाद यदि मन में बदले की भावना, घृणा और कड़वाहट बनी रहे तो वह क्षमा नहीं है। उत्तम क्षमा वह है, जिसमें व्यक्ति भीतर की कटुता को समाप्त कर सहज, शांत और मैत्रीपूर्ण भाव में रहना सीख जाए।

 

अपराध से कठोरता, व्यक्ति से नहीं घृणा

 

मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि अनुशासन के नाम पर किसी का अपमान करना उचित नहीं है। अपराध या गलती के प्रति कठोरता हो सकती है, लेकिन व्यक्ति के प्रति घृणा नहीं होनी चाहिए। वचन कभी-कभी कठोर हो सकते हैं, लेकिन हृदय कठोर नहीं होना चाहिए।

 

उन्होंने गुरु-शिष्य संबंध का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरु जब शिष्य को डांटते या अनुशासित करते हैं तो उनका उद्देश्य उसे लक्ष्य से भटकने से रोकना और उसका सुधार करना होता है।

 

मुनिश्री ने कहा, “गलती होना बड़ी बात नहीं, लेकिन गलती को बार-बार दोहराते रहना बड़ी बात है।”

 

आत्मग्लानि नहीं, आत्मशुद्धि जरूरी

 

आत्मक्षमा की चर्चा करते हुए मुनिश्री ने कहा कि जब स्वयं से गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करना, पश्चाताप करना, सुधार का प्रयास करना और भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न करने का संकल्प लेना ही आत्मशुद्धि का मार्ग है।

 

बार-बार स्वयं को ‘मैं गलत हूं’ या ‘मैं पापी हूं’ कहकर आत्मग्लानि में डूबे रहना समाधान नहीं है। इससे मन कमजोर होता है। अपनी गलती को अनदेखा करना भी उचित नहीं और गलती को पकड़कर जीवनभर बैठे रहना भी उचित नहीं। सही मार्ग है—गलती पहचानना, स्वीकार करना और स्वयं को बदलना।

 

मुनिश्री ने कहा कि प्रतिक्रमण और कायोत्सर्ग का उद्देश्य भी व्यक्ति को अपने भीतर झांकने तथा अपने दोषों को दूर करने की प्रेरणा देना है। केवल ‘सॉरी’ कह देना क्षमा नहीं है। क्षमा तब सार्थक होती है, जब भीतर से गलती का एहसास हो और उसे दोबारा न दोहराने का संकल्प भी हो।

 

रिश्तों में पुरानी गलतियों का हिसाब न रखें

 

परिवार के संदर्भ में मुनिश्री ने माता-पिता को संदेश देते हुए कहा कि बच्चों की पुरानी गलतियों का हिसाब बार-बार नहीं दोहराना चाहिए। ‘तुमने पहले भी ऐसा किया था’ या ‘तुम तो ऐसे ही हो’ जैसे शब्द बच्चे के मन में हीनता और दूरी पैदा कर सकते हैं।

 

उन्होंने कहा कि अनुशासन आवश्यक है, लेकिन उसके पीछे प्रेम और कल्याण की भावना होनी चाहिए। इसी प्रकार बच्चों को भी माता-पिता के अनुशासन के पीछे उनके हित और भविष्य की चिंता को समझना चाहिए।

 

मुनिश्री ने कहा कि क्षमा का अर्थ यह भी नहीं कि हर संबंध को पहले जैसा बना लिया जाए। यदि किसी व्यक्ति से भविष्य में नुकसान की आशंका है तो उससे व्यवहारिक दूरी रखना समझदारी है, लेकिन मन में उसके प्रति घृणा और प्रतिशोध रखना उचित नहीं।

 

पुरानी घटना याद आना अलग बात है और उस घटना के कारण आज भी भीतर क्रोध और द्वेष पालना अलग बात है। घाव भरने के बाद निशान रह सकता है, लेकिन दर्द नहीं रहना चाहिए।

 

हजारों से नहीं, उन दो-चार लोगों से मांगें क्षमा जिनसे मन में कड़वाहट है

 

मुनिश्री ने कहा कि क्षमा पर्व की वास्तविक कसौटी हजारों लोगों से औपचारिक रूप से ‘क्षमा-क्षमा’ कहने में नहीं, बल्कि उन दो-चार लोगों से क्षमा मांगने में है, जिनके प्रति हमारे मन में वास्तविक कड़वाहट है।

 

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार पौधे को ऊपर से पानी देने के साथ उसकी जड़ में लगे कीड़े को हटाना जरूरी है, उसी प्रकार जीवन में बाहर से धार्मिक आचरण के साथ मन की जड़ में बैठी कड़वाहट को भी निकालना आवश्यक है।

 

उन्होंने कहा कि क्षमा मांगने से प्रतिष्ठा कम नहीं होती, बल्कि व्यक्ति की गरिमा बढ़ती है। जो वास्तव में बड़ा होता है, वही अपनी गलती स्वीकार करने और क्षमा मांगने का साहस रखता है।

 

क्रोध को दबाना नहीं, उसे जीतना सीखें

 

क्रोध पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि क्रोध अचानक विस्फोट के रूप में दिखाई देता है, लेकिन उससे पहले मन और शरीर कई संकेत देने लगते हैं—मिजाज बिगड़ना, चेहरे पर तनाव आना, आवाज ऊंची होना आदि। इन संकेतों को पहचानकर क्रोध को भीतर प्रवेश करने से पहले रोकना चाहिए।

 

उन्होंने स्पष्ट किया कि क्रोध को दबाना और क्रोध को जीतना दो अलग-अलग बातें हैं। केवल मुंह बंद कर लेने से क्रोध समाप्त नहीं होता, यदि भीतर उबाल बना हुआ है। वास्तविक विजय तब है, जब मन भी शांत हो जाए और घटना का विष भीतर शेष न रहे।

 

मुनिश्री ने प्रेरक संदेश देते हुए कहा, “सामने वाला अपने स्वभाव से बाहर जाए, लेकिन हमें अपने स्वभाव से बाहर नहीं जाना चाहिए।”

 

हजारों श्रद्धालुओं ने सुना क्षमा धर्म का संदेश

 

इस अवसर पर विभिन्न राज्यों से आए हजारों श्रद्धालु शंकासमाधान कार्यक्रम में उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने क्षमा धर्म से संबंधित विभिन्न प्रश्न मुनिश्री के समक्ष रखे, जिनका उन्होंने सहज, सटीक और व्यवहारिक समाधान प्रदान किया।

 

गुणायतन प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि शंकासमाधान कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने भाग लिया। मुनिश्री के मार्गदर्शन से श्रद्धालुओं ने क्षमा धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझा तथा उसे अपने जीवन और व्यवहार में उतारने का संकल्प लिया।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो.: 9929747312

 

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