क्रोध की अग्नि को क्षमा से शांत कर आत्मशांति की ओर बढ़ें : मुनि श्री प्रणवसागर जी

धर्म

क्रोध की अग्नि को क्षमा से शांत कर आत्मशांति की ओर बढ़ें : मुनि श्री प्रणवसागर जी

 

दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में 208 शिविरार्थियों ने लिया भाग | उत्तम क्षमा धर्म के संदेश से गूंजा धर्मसभा परिसर

 

कोटा, 16 सितम्बर।

दशलक्षण महापर्व के प्रथम दिवस उत्तम क्षमा धर्म की आराधना के साथ धर्मनगरी का वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्तिभाव से सराबोर रहा। दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में 208 शिविरार्थियों ने सहभागिता कर आत्मशुद्धि, संयम और संस्कारों की साधना का संकल्प लिया।

 

 

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने कहा कि क्षमा मनुष्य के जीवन का ऐसा दिव्य गुण है, जो क्रोध की अग्नि को शांत कर आत्मा में शांति, मैत्री और सद्भाव का संचार करता है। क्रोध विवेक का नाश कर देता है, इसलिए क्रोध पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची साधना है।

उन्होंने कहा कि पर्व केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मानंद की ओर बढ़ने का अवसर है। पर्युषण ऐसा पावन पर्व है, जिसके माध्यम से कर्मों के क्षय, संवर और निर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने क्षमा की महत्ता समझाते हुए कहा कि वाहन के लिए ब्रेक जितना आवश्यक है, जीवन में क्रोध को नियंत्रित करने के लिए क्षमा भी उतनी ही आवश्यक है।

 

प्रीति, प्रेम और वात्सल्य से होता है क्रोध का क्षय

 

मुनिश्री ने कहा कि जहां प्रीति, प्रेम और वात्सल्य होता है, वहां क्रोध के लिए स्थान नहीं रहता। इन भावों के अभाव में ही मनुष्य के भीतर विरोध और क्रोध जन्म लेते हैं।

 

उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तम क्षमा केवल सामने वाले के क्षमा मांगने पर उसे माफ कर देना नहीं है, बल्कि निस्वार्थ भाव से क्षमा करना, सामने वाला क्षमा करे या न करे, उसके प्रति मैत्रीभाव बनाए रखना और प्रतिशोध की भावना का पूर्ण त्याग करना ही उत्तम क्षमा का वास्तविक स्वरूप है।

 

मुनिश्री ने कहा कि धर्म केवल सूचना और ज्ञान देने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन में परिवर्तन लाने की प्रेरणा है। लौकिक शिक्षा ज्ञान बढ़ाती है, जबकि धर्म मनुष्य को अपने विकारों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है। अपने लिए जो हितकारी है, वही दूसरों के लिए भी हितकारी हो—यही निस्वार्थ जीवन का आधार है।

 

कषायों पर नियंत्रण ही आत्मसाधना का वास्तविक पुरुषार्थ

 

इस अवसर पर ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायें आत्मा के स्वरूप को ढक देती हैं। क्रोध कर्म के उदय और बाहरी निमित्तों से जागृत हो सकता है, लेकिन उस पर नियंत्रण रखना हमारे पुरुषार्थ का विषय है।

 

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बर्फ अग्नि के निकट रहकर भी अपनी शीतलता का स्वभाव नहीं छोड़ती, उसी प्रकार धर्म और सद्भाव से जुड़ा व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी क्षमा और शांति का भाव बनाए रख सकता है।

 

मुनिश्री ने कहा कि क्रोध भी एक व्यवहार है और व्यवहार में सुधार के माध्यम से ही निश्चय की ओर परिवर्तन का मार्ग खुलता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने परिणामों का निरंतर पर्यवेक्षण करना चाहिए। क्रोध आने पर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय स्वयं को देखना चाहिए और जीवन में धर्म, प्रकाश, शांति, सद्भाव एवं सहिष्णुता को स्थान देना चाहिए।

 

उत्तम क्षमा का वास्तविक स्वरूप दूसरों को क्षमा करने के साथ-साथ अपने भीतर से क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध की भावना को समाप्त करना है। यही आत्मशांति का मार्ग और उत्तम क्षमा धर्म की सार्थक साधना है।

 

🌼 208 शिविरार्थियों ने लिया आध्यात्मिक साधना का संकल्प

 

शिविर निदेशक एवं अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में 208 शिविरार्थियों ने भाग लिया। शिविरार्थियों को धोती-दुपट्टा एवं साड़ी, धार्मिक एवं पूजन सामग्री, शिविरार्थी किट, भोजन एवं फलाहार सहित आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं।

 

शिविर में महिलाओं ने एक समान साड़ी तथा पुरुषों ने सफेद धोती-दुपट्टा धारण कर धार्मिक एकरूपता और अनुशासन का परिचय दिया। शिविरार्थियों ने एक समय शुद्ध भोजन ग्रहण करते हुए धर्म-साधना में सहभागिता की। दिनभर की धार्मिक गतिविधियों के बाद महाआरती का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ सहभागिता की।

 

🌺 विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन

 

उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। आदिश, राजीव एवं ऋषि सिंघई परिवार तथा राजेश, सोनल एवं ओमांशी सेठिया परिवार द्वारा भी श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन किया गया।

 

श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; आदिश, राजीव एवं ऋषि सिंघई परिवार; राजेश, सोनल एवं ओमांशी सेठिया परिवार तथा धनराज एवं आशा जेठानिवाल परिवार द्वारा किया गया।

 

श्री धर्मचंद धनोप्या एवं मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया, सुशीला ठोरा सहित श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। इस अवसर पर भक्तामर विधान का भी श्रद्धापूर्वक आयोजन हुआ।

 

श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य जम्बू-मोनिका सोगानी परिवार को प्राप्त हुआ।

 

वहीं श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री निर्मल जी सेठिया को प्राप्त हुआ।

 

मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

 

🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश

 

“क्षमा को जीवन का स्वभाव बनाएं, कषायों पर विजय पाएं और आत्मशांति की ओर बढ़ें”

 

उत्तम क्षमा केवल दूसरों को क्षमा करने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर से क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध की भावना को समाप्त करने का नाम है।

 

क्रोध विवेक को नष्ट करता है, जबकि क्षमा आत्मा में शांति, मैत्री, प्रेम और सद्भाव का संचार करती है। परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने परिणामों पर नियंत्रण रखते हुए प्रतिक्रिया के स्थान पर संयम और सहिष्णुता को अपनाना ही धर्म-साधना की सार्थक दिशा है।

 

क्षमा को जीवन का स्वभाव बनाएं, कषायों पर विजय प्राप्त करें और आत्मशांति की ओर कदम बढ़ाएं—यही उत्तम क्षमा धर्म की सच्ची आराधना है।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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