सबसे जुड़ने के चक्कर में खुद से दूर न हों युवा’

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‘सबसे जुड़ने के चक्कर में खुद से दूर न हों युवा’

आचार्य प्रसन्न सागरजी बोले—रोज एक घंटा स्वयं के लिए निकालें, लाइक्स-कमेंट्स को खुशी का पैमाना न बनाएं

पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ।

“जो निखरकर बिखर जाए, वह कर्तव्य है और जो बिखरकर निखर जाए, वह व्यक्तित्व है।”

आज का युवा पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ है, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि सबसे जुड़ने की कोशिश में वह खुद से ही दूर होता जा रहा है? यही सवाल युवाओं के सामने रखते हुए व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने आत्मनिरीक्षण, मौलिकता और आत्मसंतुष्टि को जीवन की वास्तविक जरूरत बताया।

 

 

गुरुभक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने ‘Gen Z—अपने ऊर्जावान युवाओं के लिए अंतर्मन से अंतर्मना की बातें’ विषय पर प्रेरणादायी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि तेज रफ्तार जिंदगी में व्यक्ति को बाहरी दुनिया से जुड़ने के साथ-साथ अपने अंतर्मन से जुड़ना भी सीखना होगा।

 

 

युवा बदल सकते हैं देश की दिशा

आचार्य श्री ने कहा कि भारत युवाओं का देश है। देश के ऊर्जावान युवक-युवतियां अपनी प्रतिभा, तकनीक, कला और नवाचार के माध्यम से नए आयाम स्थापित कर रहे हैं और भारत का नाम रोशन कर रहे हैं।

 

 

उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास केवल तकनीक की शक्ति नहीं, बल्कि पूरे युग की दिशा बदलने का सामर्थ्य है। उनकी गति, स्पष्टता और नवाचार प्रशंसनीय हैं, लेकिन इसी तेज रफ्तार के बीच आंतरिक शांति और विवेक को बनाए रखना बड़ी चुनौती है।

 

 

‘सबसे जुड़ रहे हैं, लेकिन खुद से कटते जा रहे हैं’

आचार्य श्री ने कहा कि आज हर व्यक्ति एक-दूसरे से जुड़ने का प्रयास कर रहा है। लोगों को जोड़ना अच्छी बात है, लेकिन सबसे जुड़ने के चक्कर में यदि हम स्वयं से ही कट जाएं तो यह चिंता का विषय है।

 

 

उन्होंने युवाओं से कहा कि दिन के 23 घंटे संसार, परिवार, व्यापार, मित्रों और मोबाइल को दें, लेकिन एक घंटा केवल स्वयं के लिए जरूर निकालें।

 

 

इस एक घंटे में बाहरी शोर से दूर होकर मौन बैठें, अपने दिन और अपने व्यवहार का आत्मनिरीक्षण करें तथा अपने भीतर की आवाज को सुनें। जब मन का आंतरिक कोलाहल शांत होगा, तभी जीवन के निर्णय अधिक स्पष्ट, सटीक और प्रभावी होंगे।

 

 

लाइक्स-कमेंट्स नहीं, खुद की खुशी बने सफलता का पैमाना

सोशल मीडिया की बढ़ती निर्भरता पर आचार्य श्री ने युवाओं को सचेत करते हुए कहा कि आज इंसान की खुशी भी दूसरों की प्रतिक्रिया पर निर्भर होती जा रही है।

 

 

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर फोटो या पोस्ट डालने के बाद यदि अपेक्षित लाइक्स, कमेंट्स या व्यूज नहीं मिलते तो व्यक्ति का मन अशांत हो जाता है। चेहरे की प्रसन्नता ऐसे गायब हो जाती है, जैसे चुनाव हारने के बाद नेता की।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि युवाओं को अपनी खुशी और सफलता का पैमाना दूसरों की प्रतिक्रिया को नहीं बनाना चाहिए। अपनी मौलिकता, योग्यता और सामर्थ्य को पहचानना ही वास्तविक आत्मविश्वास है।

 

आत्मसंतुष्टि और चरित्र ही असली सफलता

आचार्य श्री ने कहा कि हम परमात्मा की सबसे सुंदर कृति हैं। इसलिए अपनी पहचान दूसरों की टीका-टिप्पणी से नहीं, बल्कि अपनी योग्यता, कर्म और चरित्र से बनाएं।

उन्होंने कहा कि जीवन की वास्तविक सफलता केवल उपलब्धियों और प्रसिद्धि में नहीं है। वास्तविक सफलता वह है, जिसमें व्यक्ति को भीतर से संतुष्टि मिले, मन शांत रहे और चरित्र मजबूत हो।

तकनीक का उपयोग करें, तकनीक को जीवन का स्वामी न बनने दें

युवाओं का आह्वान करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि तकनीक आज की आवश्यकता है, उसका उपयोग अवश्य करें, लेकिन तकनीक को अपने जीवन का स्वामी न बनने दें।

दुनिया से जुड़े रहिए, नई चीजें सीखिए, आगे बढ़िए और अपने सपनों को पूरा कीजिए, लेकिन इस दौड़ में स्वयं से अपना संबंध कभी मत तोड़िए। जिस दिन व्यक्ति अपने अंतर्मन से जुड़ जाता है, उसी दिन उसे जीवन की वास्तविक दिशा दिखाई देने लगती है।

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल के अनुसार प्राप्त जानकारी।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

 

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