हमारी संस्कृति इस बात के लिए संकेत देती है कि व्यक्ति सबसे पहले अपने अपराधों के लिए स्वीकार करे,विराग सागर महाराज

धर्म

हमारी संस्कृति इस बात के लिए संकेत देती है कि व्यक्ति सबसे पहले अपने अपराधों के लिए स्वीकार करे,विराग सागर महाराज

पथरिया

पूज्य आचार्य श्री विरागसागर महाराज ने विरागोदय़ तीर्थ पथरिया मे धर्म सभा को सबोधित करते हुए गलतियों को स्वीकार कर उनका पश्याताप करने की बात पर जोर देते हए कहा की प्रतिक्रमण का अर्थ होता है कि जीवन में हर प्राणी से गलतियां होती हैं, दोष, अपराध होजाते हैं, अपराधों को कब तक अंदर रखें,हमारी संस्कृति इस बात के लिए संकेत देतीहै कि व्यक्ति सबसे पहले अपने अपराधोंके लिए स्वीकार करे, जो हो गए हैं उसकेलिए पश्चाताप करें, पुनः न करने कीप्रतिज्ञा भगवान, गुरु के चरणों में लें तोअपराध धुल जाते हैं। हमारी दंड संहिता मेंभी ऐसा उल्लेख है कि कोई व्यक्ति अपराधको स्वीकार करता है खेद व्यक्त करता हैतो बड़े-बड़े अपराध भी क्षमा हो जाते हैं।व्यावहारिक जीवन में भी ऐसा होता है

 

 

उन्होने कहा यदि किसी को गलती से पैर लग गया औरक्षमा मांग लें तो उसे माफ कर दिया जाता
है।प्रवचन देते आचार्यश्री विराग सागर महाराजआचार्यश्री ने बताया कि चयन शास्त्रों केअनुसार सात प्रकार के प्रतिक्रमण होते हैं उसमें एक दूसरा प्रतिक्रमण है युगप्रतिक्रमण, आमतौर पर हर व्यक्ति कोतात्कालिक में अपराधों को धोना चाहिए,नहीं कर सकते तो सुबह-शाम, 15 दिन में4 माह में, 1 साल में नहीं तो 5 वर्ष कीअवधि में अपराधों को धोना चाहिए। तोमानव, मानव ही नहीं एक दिन महामानवबन सकता है, भगवत अवस्था को प्राप्तकर सकता है। इसी पद्धति को 4 तारीख को निश्चित किया गया है। इसमें व्यक्तिआंतरिक और बाहरी रूप से शुद्ध मन से बैठता है इसमें तीन चार घंटें तक कार्यक्रम चलता है और व्यक्ति अपने अपराधों केलिए प्रकट करता है और क्षमा मांगता है।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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