मंदिर में ही नहीं, हर जगह है प्रभु की उपस्थिति धर्मस्थल में झुकता है सिर, लेकिन जीवन के व्यवहार में भी दिखना चाहिए धर्म : आचार्य सुनीलसागरजी
इंदौर।
नेमी नगर जैन कॉलोनी। धर्मस्थल पर श्रद्धा से सिर झुकाना तभी सार्थक है, जब वही धर्म हमारे विचारों, वाणी और व्यवहार में भी दिखाई दे। आचार्य श्री सुनीलसागरजी गुरुदेव ने प्रवचन में धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझाते हुए कहा कि मनुष्य धर्मस्थलों में तो गलत कार्य करने से बचता है, लेकिन जैसे ही वह वहां से बाहर निकलता है, अपने कर्मों के प्रति लापरवाह हो जाता है। यही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है।
आचार्य श्री ने कहा कि लोग मंदिर में पाप करने से, मस्जिद में गलत कार्य करने से, गुरुद्वारे में किसी को कष्ट देने से और चर्च में किसी को गाली देने से बचते हैं, लेकिन क्या धर्म केवल इन स्थानों की सीमाओं तक ही है? प्रभु की उपस्थिति को केवल किसी एक धर्मस्थल तक सीमित मानना हमारी सोच की सीमा है।
उन्होंने कहा कि कर्मों का सिद्धांत हर जगह लागू होता है। मनुष्य भले ही अपने कर्मों को दूसरों से छिपा ले, लेकिन कर्मों के परिणाम से स्वयं नहीं बच सकता। जैसे कोई व्यक्ति छिपकर कोयला खाए तो उसका मुंह काला होना निश्चित है, उसी प्रकार किए गए कर्मों का फल भी एक न एक दिन भोगना ही पड़ता है।
धर्मस्थल केवल पूजा की जगह नहीं, जीवन की पाठशाला हैं
आचार्य श्री ने कहा कि धर्मस्थल वास्तव में धर्म, संस्कार और सदाचार की शिक्षा देने वाली पाठशाला हैं। वहां हम जो सीखते हैं, उसकी असली परीक्षा मंदिर की चौखट के भीतर नहीं, बल्कि वहां से बाहर निकलने के बाद हमारे व्यवहार में होती है।
यदि मंदिर में जाकर पूजा करने के बाद हम किसी को दुख पहुंचाते हैं, झूठ बोलते हैं, छल-कपट करते हैं या किसी के अधिकार का हनन करते हैं, तो हमारी धार्मिकता अधूरी है।
उन्होंने संदेश दिया कि सच्ची धार्मिकता केवल पूजा-अर्चना में नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। हमारे विचार शुद्ध हों, वाणी मधुर हो और व्यवहार में करुणा, संयम तथा सदाचार हो—यही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।
धर्मस्थल में सिर झुकाना आसान है, लेकिन जीवन में धर्म को उतारना ही सच्ची साधना है।
माही जैन धीरावत, पीपलखूंट, प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312







