मोबाइल में समय गंवाने के बजाय दिन में तीन बार करें भजन, मन को मिलेगी शांति : गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी

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मोबाइल में समय गंवाने के बजाय दिन में तीन बार करें भजन, मन को मिलेगी शांति : गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी

केशवरायपाटन में धर्मसभा के दौरान माताजी ने कहा—संगीत मन को स्थिरता देता है, माताएं स्वयं भजन सीखेंगी तभी बच्चों को दे पाएंगी संस्कार

केशवरायपाटन।
आज के दौर में मोबाइल मनुष्य के जीवन का अहम हिस्सा बन गया है, लेकिन यही मोबाइल यदि जरूरत से ज्यादा समय ले रहा है तो व्यक्ति को भीतर से खाली भी कर सकता है। ऐसे में जब मन उदास या अशांत हो, तब मोबाइल पर व्यर्थ समय बिताने के बजाय भगवान का भजन करना चाहिए। भजन मन को शांति देने के साथ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

 

 

यह प्रेरणादायी संदेश अतिशय क्षेत्र में मंगलवार को आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं को दिया।

भोजन की तरह भजन भी जरूरी

गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि जिस प्रकार मनुष्य अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दिन में कम से कम तीन बार भोजन करता है, उसी प्रकार आत्मा की शांति और मन की स्थिरता के लिए दिन में कम से कम तीन बार भगवान का भजन करना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गीत और संगीत का सदियों से विशेष महत्व रहा है। पूर्व में वर्णित 72 कलाओं में गीत कला भी महत्वपूर्ण मानी गई है। गीत लिखना और उसे भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करना अपने आप में एक विशेष प्रतिभा है।

 

दृष्टिहीन होकर भी संगीत की दुनिया में छोड़ी अमिट छाप

माताजी ने संगीत सम्राट दिवंगत रविंद्र जैन का उदाहरण देते हुए कहा कि जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद उनकी लेखनी और संगीत प्रतिभा अद्भुत थी। उन्होंने अपनी रचनाओं और भजनों के माध्यम से समाज को प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि रविंद्र जैन द्वारा रचित ‘वर्तमान को वर्धमान की आवश्यकता है’ और ‘जय जिनेंद्र बोलो’ जैसे अनेक भजन आज भी लोगों के हृदय में बसे हुए हैं। फिल्मों में गीत-संगीत देने के साथ ही रामायण के लिए उनके द्वारा गाए गए भजन भी लोगों के बीच लोकप्रिय रहे हैं।

 

संगीत कम, शोर ज्यादा दिखाई दे रहा

गणिनी माताजी ने वर्तमान समय की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज संगीत की अपेक्षा शोर अधिक दिखाई देने लगा है। जबकि शास्त्रीय संगीत और मधुर भजन मन को शांति, एकाग्रता और स्थिरता प्रदान करते हैं।

उन्होंने कहा कि संगीत भी मन को शांत करने का एक प्रकार का व्यायाम है। यदि मन अशांत है तो उसे मोबाइल की स्क्रीन में उलझाने के बजाय भजन और आध्यात्मिक चिंतन की ओर ले जाना चाहिए।

 

माताएं भजन सीखेंगी, तभी बच्चों में आएंगे संस्कार

माताजी ने माताओं से विशेष रूप से आह्वान करते हुए कहा कि माताएं स्वयं भजन सीखें और गाएं। जब घर में मां भजन गाएगी, तभी बच्चों को भजन, धर्म और संस्कारों से जोड़ने का प्रभावी वातावरण तैयार होगा।

उन्होंने कहा कि मोबाइल और आधुनिक साधनों का उपयोग आवश्यकतानुसार किया जाए, लेकिन जीवन का कीमती समय व्यर्थ की गतिविधियों में गंवाने के बजाय धर्म, भजन और संस्कारों में लगाया जाना चाहिए

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

 

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