परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनिश्री 108 क्षमासागर महाराज ने अपने गुरु आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज से जुड़े संस्मरण को अमूर्त शिल्पी पुस्तक में साँझा किया
निर्भयता
बुंदेलखंड में आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज का यह पहला चातुर्मास था। कुंडलपुर में एक दिन रात्रि के अंधेरे में कहीं से बिच्छू आ गया और उसने एक बहिन को काट लिया। पंडित जगमोहन लाल जी वही थे। उन्होंने उसे बहन की पीड़ा देखकर सोचा कि बिस्तर बिछाकर लिटा दूँ, सो जैसे ही बिस्तर खोला, उसमें से एक सर्प निकल आया। उसे जैसे तैसे भगाया गया।
दूसरे दिन पंडित जी ने आचार्य महाराज को सारी घटना सुनाई और कहा कि महाराज यहां तो चातुर्मास में आपको बड़ी बाधा आएगी। पंडित जी की बात सुनकर आचार्य महाराज हंसने लगे। बड़ी उन्मुक्त हंसी होती है आचार्य महाराज की। हंसकर बोले की पंडित जी यहां हमारे समीप भी कल दो-तीन सर्प खेल रहे थे। यह तो जंगल है। जीव जंतु तो जंगल में ही रहते हैं। इससे चातुर्मास में क्या बाधा? वास्तव में, हमें जंगल में ही रहना चाहिए और सदा परिषह करने के लिए तत्पर रहना चाहिए कर्म निर्जरा परिषह जय से होती है।
उपसर्ग और परिषह को जीतने के लिए निर्भयता व तत्परता ही साधुता की सच्ची निशानी है।
मुनिश्री 108 क्षमासागर महाराज पुस्तक अमूर्त शिल्पी पुस्तक आलेख
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312




