गुरु के चश्मे से संसार को देखने वाले शिष्य : मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज
मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज के प्रवचनों में, उनकी लेखनी में और उनके साथ हुई चर्चाओं में एक बात सहज ही अनुभव होती थी—मानो उन्होंने अपने गुरु, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का चश्मा पहन रखा हो। वे उसी दृष्टि से देखते थे, उसी विवेक से समझते थे और उसी भाव से बोलते थे।
गुरु का प्रसंग आते ही उनका गदगद भाव, रूँधा हुआ गला और सजल नेत्र उनके भीतर उमड़ती श्रद्धा और समर्पण की गहराई को शब्दों से कहीं अधिक अभिव्यक्त कर देते थे। आचार्य श्री के प्रति उन्होंने अपने ‘स्व’ को जैसे पूरी तरह विलीन कर दिया था।
यह अकिंचन वृत्ति का उत्कर्ष था—
“मैं कुछ नहीं, सब आप।”
उन्होंने अपने गुरु को केवल पढ़ा या सुना नहीं, बल्कि देखते गए, सुनते गए और उसी दृष्टि में ढलते गए। कोई शिष्य केवल अध्ययन और शिक्षा से गढ़ा गया हो, ऐसा नहीं; मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज का जीवन इस बात का उदाहरण था कि गुरु के आचरण को निरंतर देखते-सुनते हुए भी शिष्य भीतर से उसी स्वरूप में ढल सकता है।
गुरु की आज्ञा उनके लिए केवल निर्देश नहीं, बल्कि उनके समस्त अस्तित्व का आधार थी। उस आज्ञा में न संशय था, न तर्क-वितर्क और न ही किसी प्रकार का अहंभाव। दूर रहकर भी गुरु के प्रति उनका यह समर्पण उतना ही सहज और अखंड दिखाई देता था।
जब साधना साधते-साधते चरित्र बन जाए, तब अलग से साधना करने की आवश्यकता कहाँ रह जाती है? मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज के जीवन में गुरु-भक्ति और गुरु-समर्पण कुछ ऐसा ही सहज चरित्र बन चुका था।
दशकों के इस अद्भुत गुरु-समर्पण के अनगिनत क्षणों में से कुछ भावपूर्ण क्षणों का संकलन यह पुस्तक है। इसमें मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज ने अपने आराध्य गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रति जो लिखा, कहा और अनुभव किया, उसकी भाव-संपदा संजोई गई है।
यह केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि एक शिष्य के हृदय में गुरु के प्रति समर्पण, श्रद्धा और आत्म-विलय की जीवंत अनुभूति है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मोबाइल : 9929747312




