केश लोचन के साथ मोक्षमार्ग की ओर बढ़ा एक और कदम, श्राविका मंजुला जैन ने जगाया त्याग-वैराग्य का भाव
बड़वानी के जैन इतिहास में पहली श्राविका बनीं मंजुला जैन, जिन्होंने किया केश लोचन; क्षुल्लिका माताजी की साधना देखकर जागे संयम के भाव
धामनोद/बड़वानी।
त्याग, तप और संयम की राह पर बढ़ते कदम जब वैराग्य की अनुभूति से जुड़ते हैं, तो साधना का मार्ग और भी प्रेरणादायी बन जाता है। ऐसा ही भावपूर्ण प्रसंग बड़वानी के स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में देखने को मिला, जहां 8 प्रतिमा के नियम धारण करने वाली श्राविका मंजुला जैन ने क्षुल्लिका माताजी के केश लोचन देखकर स्वयं भी केश लोचन के भाव प्रकट किए।
बड़वानी में चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका 105 सुप्रज्ञमति माताजी ससंघ विराजमान हैं। इसी दौरान क्षुल्लिका 105 संभवमति माताजी के केश लोचन का प्रसंग चल रहा था। केश लोचन की इस कठोर साधना को देखकर श्राविका मंजुला जैन के अंतर्मन में भी त्याग और वैराग्य के भाव जागृत हुए। उन्होंने आर्यिका 105 सुप्रज्ञमति माताजी के समक्ष केश लोचन की भावना व्यक्त की।

पूज्य आर्यिका 105 सुप्रज्ञमति माताजी ने अपने वरद हस्त से श्राविका मंजुला जैन का केश लोचन किया। यह भावपूर्ण प्रसंग उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणादायी रहा।
9 वर्षों से त्याग और संयम की साधना
श्राविका मंजुला जैन पिछले करीब 9 वर्षों से त्याग और संयम के मार्ग पर अग्रसर हैं। उन्होंने गृहस्थ जीवन में रहते हुए 2 प्रतिमा के व्रत से अपनी साधना की शुरुआत की। इसके बाद क्रमशः 7 प्रतिमा और फिर 8वीं प्रतिमा के नियम धारण किए। उन्होंने यह व्रत आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज से ग्रहण किए थे।
बड़वानी के जैन इतिहास में विशेष उपलब्धि
गौरतलब है कि बड़वानी के जैन इतिहास में मंजुला जैन पहली श्राविका हैं, जिन्होंने केश लोचन किया है। उनका यह कदम समाज में त्याग, संयम और वैराग्य की भावना को प्रेरित करने वाला माना जा रहा है।
केश लोचन से जागता है वैराग्य
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका 105 सुप्रज्ञमति माताजी ने कहा कि प्रत्येक श्रावक-श्राविका को मुनिराज और आर्यिकाओं की केश लोचन एवं आहारचर्या जैसी साधनाओं को अवश्य देखना चाहिए। इन साधनाओं को देखकर मन में वैराग्य और आत्मकल्याण की भावना जागृत होती है।
माताजी ने दान और प्रभावना के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान हमेशा ऐसी वस्तुओं का करना चाहिए, जिनसे किसी जीव की हिंसा न हो। अहिंसक वस्तुओं का दान पुण्य का कारण बनता है, जबकि हिंसक वस्तुओं के कारण जीवघात या पापाचार होने पर दाता भी उस कर्म का सहभागी बनता है।
उन्होंने मंदिर में दिए जाने वाले दान के सदुपयोग, पूजा सामग्री, भगवान के परिमार्जन में उपयोग होने वाले अंगोछे तथा धार्मिक कार्यों से जुड़ी अनेक बारीकियों की जानकारी भी धर्मसभा में दी।
श्राविका मंजुला जैन का यह केश लोचन केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि त्याग, संयम और आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ते कदम का प्रेरक प्रसंग बन गया।
विशेष सहयोग एवं रिपोर्ट : दीपक जैन प्रधान, धामनोद
रिपोर्ट : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
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