समताभाव की शक्ति: जब संसार की भीड़ में भी मन अडिग रहे
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का अद्भुत प्रसंग, मुनिश्री क्षमासागर महाराज की लेखनी से
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के दीक्षित शिष्य परम पूज्य मुनिश्री 108 क्षमासागर महाराज ने अपनी पुस्तक ‘समताभाव अमूर्त शिल्पी’ में आचार्य श्री के साथ जुड़े अनेक प्रेरणादायी संस्मरणों को शब्दों में पिरोया है। इन्हीं संस्मरणों में एक प्रसंग ऐसा है, जो समताभाव की गहराई और आचार्य श्री की आंतरिक स्थिरता को सहज ढंग से समझाता है।
जब एक श्रद्धालु चाहते थे आचार्य श्री की एक नजर
मुनिश्री क्षमासागर महाराज लिखते हैं कि वर्ष 1978 की बात है। सिद्ध क्षेत्र द्रोणगिरि में चौबीसी की छत पर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज बैठे हुए थे। उस समय वहां गजरथ का विशाल कार्यक्रम चल रहा था।
साहू अशोक जी भी आचार्य श्री के दर्शन के लिए पहुंचे। वे दो बार आचार्य श्री के चरणों के आसपास से होकर लौटे, मन में यही भाव था कि शायद गुरुदेव एक बार उनकी ओर दृष्टि उठा दें, दो शब्द बोल दें। लेकिन आचार्य श्री अपने लेखन और साधना में इतने तल्लीन थे कि उनका ध्यान बाहर की हलचल की ओर नहीं था।
अशोक जी ने किसी से पूछा कि ऐसा क्या किया जाए जिससे महाराज एक बार उनकी ओर देख लें? उन्हें सलाह दी गई कि आचार्य श्री के चरणों में बैठकर अपने जीवन के कल्याण के लिए कोई त्याग लेने की भावना व्यक्त करें।
उन्होंने ऐसा ही किया।चरणों में बैठकर उन्होंने कहा—“भगवन! अपने जीवन के कल्याण के लिए मैं कुछ त्याग लेना चाहता हूं।”आचार्य श्री ने दृष्टि उठाई और पूछा कि कौन त्याग लेना चाहता है। अशोक जी ने विनम्रता से रात्रि भोजन आदि के त्याग का नियम लेने की इच्छा व्यक्त की।लेकिन अवसर पाकर उन्होंने अपने मन का प्रश्न भी सामने रख दिया। महाराज, इतनी भीड़ में आपको कोई बाधा नहीं होती
उन्होंने पूछा—“महाराज! इतने लोग आपके पास आ रहे हैं, जा रहे हैं। आप छत पर बैठकर अपने लेखन में लगे रहते हैं। आपको किसी से कोई परेशानी या बाधा नहीं होती?”
आचार्य श्री ने सहजता से पूछा—“आप गाड़ी चलाते हैं?”
उन्होंने कहा—“हां महाराज।”
आचार्य श्री ने फिर पूछा—“जब गाड़ी लंबी ढलान पर आती है, तब क्या करते हैं?”
उत्तर मिला—“महाराज, पेट्रोल बचाने के लिए गाड़ी को न्यूट्रल में डाल देते हैं।”
आचार्य श्री ने इसी सामान्य-सी बात में जीवन का असाधारण दर्शन समझा दिया—
“जैसे आप गाड़ी को ढलान में आने पर न्यूट्रल में डाल देते हैं, वैसे ही जब हमारे आसपास ज्यादा भीड़-भाड़ होती है तो हमें अपना काम करना रहता है, इसलिए हम अपनी गाड़ी न्यूट्रल में डाल देते हैं। फिर बाहर की परिस्थितियों का हम पर कोई प्रभाव नहीं होता।”
समताभाव ही जीवन की सच्ची स्थिरता
आचार्य श्री का यह कथन केवल एक प्रसंग नहीं, बल्कि आत्म-साधना का गहरा संदेश है। संसार में सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि, प्रशंसा-आलोचना और पुण्य-पाप का क्रम चलता रहता है। यदि मन हर परिस्थिति के साथ बदलता रहे तो व्यक्ति कभी स्थिर नहीं रह सकता।
मुनिश्री क्षमासागर महाराज के शब्दों में, आचार्य श्री का भाव था—
“अगर मैं वीतरागी बन जाऊं, अगर मैं समताभाव धारण कर लूं, तो चाहे पुण्य का उदय आए या पाप का उदय आए, मेरा बिगाड़ करने वाला नहीं है। वह अपना फल देकर चला जाएगा।”
यही समताभाव की शक्ति है। परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन जो व्यक्ति भीतर से स्थिर हो जाता है, वह संसार की हलचल के बीच भी अपनी साधना और अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता।
संसार की भीड़ को रोकना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन उस भीड़ का प्रभाव अपने भीतर प्रवेश न करने देना हमारे हाथ में अवश्य है। यही समताभाव का सार है।
मुनिश्री 108 क्षमासागर महाराज द्वारा लिखित पुस्तक ‘समताभाव अमूर्त शिल्पी’ के आलेख से।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मोबाइल : 9929747312




