कला वह हुनर है, जो सामान्य वस्तु को भी बना देती है उपयोगी और सुंदर : स्वस्तिभूषण माताजी
मनुष्य और पशु के जीवन में सबसे बड़ा अंतर कला का, कला से जीवन में आता है आनंद और व्यवस्था
केशवरायपाटन।
परम पूजनीय भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि मनुष्य का जीवन केवल आवश्यकताओं से नहीं, बल्कि विभिन्न कलाओं के सदुपयोग से सुंदर, व्यवस्थित और आनंदमय बनता है। कला जीवन में प्रसन्नता का संचार करती है और सामान्य वस्तुओं को भी उपयोगी एवं आकर्षक बनाने की क्षमता प्रदान करती है।
श्रीमुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र की धर्मसभा में प्रवचन करते हुए माताजी ने कहा कि मनुष्य और पशु के जीवन में सबसे बड़ा अंतर कला का है। पशु प्रकृति से जैसा प्राप्त होता है, उसी के अनुरूप जीवन व्यतीत करते हैं, जबकि मनुष्य अपनी बुद्धि और कला के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित करने के साथ-साथ उसे सुंदर और सुखद बनाने का प्रयास करता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के पास ऐसी अद्भुत कला है कि वह सामान्य से सामान्य वस्तु को भी उपयोगी और स्वादिष्ट बना सकता है। उदाहरण देते हुए माताजी ने कहा कि यदि मनुष्य को घास भी दे दी जाए तो वह उसे सीधे खाने के बजाय अपनी कला और बुद्धि का प्रयोग करके उससे सब्जी, रोटी, चटनी, पापड़ जैसे अनेक व्यंजन बनाने का प्रयास करेगा। किसी सामान्य वस्तु को सुंदर, उपयोगी और आनंददायक रूप देना ही मनुष्य की कला है।
माताजी ने कहा कि जब किसी कार्य को कला और रुचि के साथ किया जाता है तो उसमें आनंद आने लगता है और मन भी उस कार्य में लग जाता है। यही कला जीवन की साधारण गतिविधियों को भी विशेष बना देती है।
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, परिवार में प्रेम बढ़ाने का माध्यम भी
माताजी ने गृहिणियों की पाककला का उल्लेख करते हुए कहा कि अनेक महिलाओं को भोजन बनाने का शौक होता है। वे तरह-तरह के व्यंजन बनाकर बच्चों और पति को प्रेमपूर्वक खिलाती हैं। इससे भोजन केवल आहार नहीं रहता, बल्कि परिवार में प्रेम, अपनत्व और संतोष बढ़ाने का माध्यम बन जाता है।
उन्होंने कहा कि यदि भोजन बनाते समय मन में अरुचि, तनाव या क्रोध हो तो उसका प्रभाव पूरे घर के वातावरण पर पड़ता है। वहीं प्रसन्नता और प्रेम से बनाया गया भोजन परिवार में सकारात्मकता का वातावरण पैदा करता है।
माताजी ने कहा कि समाज में कहा जाता है—“जिसके हाथ में लोई, उसका सब कोई।” परिवार के सदस्यों को प्रेम और प्रसन्नता से भोजन बनाकर खिलाने से घर में संतोष और प्रसन्नता का वातावरण निर्मित होता है। गृहस्थ जीवन को सुचारु रूप से चलाने में गृहिणी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
छोटी-छोटी कलाओं का सदुपयोग बढ़ाता है पारिवारिक प्रेम
माताजी ने कहा कि भोजन बनाने की कला को केवल जिम्मेदारी समझने के बजाय प्रेम, सेवा और सृजन की कला के रूप में देखना चाहिए। घर में मौजूद छोटी-छोटी कलाओं का सकारात्मक उपयोग परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और अपनत्व को बढ़ाता है तथा अनेक विवादों को जन्म लेने से पहले ही रोक सकता है।
उन्होंने कहा कि कला केवल हाथों का हुनर नहीं, बल्कि जीवन को सुंदर ढंग से जीने की दृष्टि भी है। जिस घर में कला, प्रेम, प्रसन्नता और सहयोग का भाव होता है, वहां सामान्य जीवन भी असाधारण आनंद से भर जाता है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312




