सिर हर किसी के सामने नहीं, सत्य और गुणों के सामने झुकना चाहिए : मुनि श्री योगसागर जी महाराज

धर्म

 सिर हर किसी के सामने नहीं, सत्य और गुणों के सामने झुकना चाहिए : मुनि श्री योगसागर जी महाराज

भय, आशा, स्नेह और लोभ से नहीं, सत्य एवं वीतरागता के प्रति दृढ़ श्रद्धा से करें विनय | सम्यग्दृष्टि व्यक्ति नहीं, उसके गुणों को देखकर करता है सम्मान

कोटा, 29 अगस्त।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी विरचित रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 30 की व्याख्या करते हुए श्रद्धा, विनय और विवेक का गहरा संदेश दिया।

 

 

मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दृष्टि व्यक्ति की श्रद्धा परिस्थितियों के दबाव में नहीं बदलती। वह भय, आशा, स्नेह अथवा लोभ के कारण मिथ्या देव, मिथ्या शास्त्र या मिथ्या गुरु के समक्ष न तो झुकता है और न ही विनय करता है। उसकी श्रद्धा किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि सत्य, सद्गुण, संयम और वीतरागता पर आधारित होती है।

भय, आशा, स्नेह और लोभ—श्रद्धा को डगमगाने वाले चार कारण

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में चार ऐसी शक्तियां हैं, जो उसकी सही श्रद्धा और विवेक को विचलित कर सकती हैं—भय, आशा, स्नेह और लोभ।

कई बार व्यक्ति भय के कारण ऐसी जगह झुक जाता है, जहां उसे नहीं झुकना चाहिए। कभी किसी लाभ की आशा उसे अनुचित व्यक्ति के सम्मान के लिए प्रेरित करती है। व्यक्तिगत स्नेह के कारण कई बार सत्य-असत्य का विवेक धुंधला पड़ जाता है और लोभ व्यक्ति को अपने सिद्धांतों से समझौता करने के लिए विवश कर देता है।

उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन केवल भगवान को मान लेने का नाम नहीं है, बल्कि सत्य-असत्य का विवेक जागृत होने का नाम है। सम्यग्दृष्टि जीव व्यक्ति को देखकर नहीं, उसके गुणों को देखकर सम्मान करता है। वह अपने स्वार्थ, भय या सुविधा के कारण अपनी श्रद्धा को नहीं बदलता।

विनय का अर्थ हर किसी के सामने सिर झुकाना नहीं

मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि विनय का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य हर किसी के सामने अपना सिर झुका दे। विनय तभी सार्थक है, जब वह गुणवान, सत्यनिष्ठ, संयमी और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने वाले के प्रति हो।

यदि भय, लोभ, स्नेह अथवा स्वार्थ के कारण हमारी श्रद्धा बदल रही है, तो हमें दूसरों को देखने से पहले अपने भीतर झांकना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारा सम्यग्दर्शन वास्तव में कितना दृढ़ है।

उन्होंने कहा कि आज समाज में कई बार व्यक्ति सिद्धांतों से अधिक सुविधा को महत्व देने लगता है। जहां अपना लाभ दिखाई देता है, वहां झुक जाता है और जहां स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती, वहां अपने आदर्शों को भूल जाता है। आचार्य समन्तभद्र स्वामी का संदेश ऐसी मानसिक दुर्बलता से सावधान करता है।

धर्म सुविधा का नहीं, विवेक और सत्य का मार्ग है

मुनि श्री ने कहा कि धर्म का मार्ग सुविधा का नहीं, बल्कि विवेक, सत्य और आत्मकल्याण का मार्ग है। सत्य के रास्ते पर चलते हुए कठिनाइयां आएं, विपरीत परिस्थितियां सामने आएं, तब भी सम्यग्दृष्टि जीव अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ता।

सच्ची श्रद्धा वही है, जो परिस्थितियां बदलने पर भी न बदले और स्वार्थ के सामने न झुके।

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को आत्मपरीक्षण का संदेश देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से चार प्रश्न अवश्य करने चाहिए—

क्या मैं भय के कारण झुक रहा हूं?
क्या किसी आशा में अपना सिद्धांत छोड़ रहा हूं?
क्या अंधे स्नेह के कारण अपना विवेक खो रहा हूं?
क्या लोभ मुझे धर्म से दूर कर रहा है?

यदि इन चारों से ऊपर उठकर सत्य, अहिंसा, वीतरागता और जिनवाणी के प्रति श्रद्धा दृढ़ रखी जाए, तो सम्यग्दर्शन मजबूत होता है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

सिर व्यक्ति के सामने नहीं, सत्य और गुणों के सामने झुकाएं

मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में सिर हर किसी के सामने नहीं, बल्कि सत्य, सद्गुण, संयम और वीतरागता के सामने झुकना चाहिए।

भय और लोभ से किया गया नमन आत्मकल्याण का साधन नहीं बनता, जबकि विवेकपूर्वक किया गया विनय धर्म की शोभा बढ़ाता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हो जाएं, यदि सत्य के प्रति श्रद्धा और धर्म के प्रति निष्ठा अडिग है, तो यही सम्यग्दर्शन की वास्तविक पहचान है।

🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश

“सिर हर किसी के सामने नहीं,
सत्य और गुणों के सामने झुकाइए।

भय से नहीं, विवेक से विनय कीजिए;
लोभ से नहीं, श्रद्धा से धर्म अपनाइए।

व्यक्ति नहीं, उसके गुणों को देखिए;
स्वार्थ नहीं, सत्य को महत्व दीजिए।

जो विपरीत परिस्थितियों में भी
धर्म और सिद्धांतों पर अडिग रहे—
वही सच्चा सम्यग्दृष्टि जीव है।”

🌺 धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन

धर्मसभा के दौरान विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि सम्यग्दर्शन भक्ति एवं चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री टीकमचंद जी, श्रीमती प्रमिला जी, श्री भावेश जी, श्री रोहित जी, श्रीमती पायल जी, गर्व एवं अक्षांत तथा समस्त ठग परिवार (नैनवां वाले) एवं श्रीमती पुष्पा बाई जी, श्री महावीर जी, श्री लोकेश जी, श्री राजेश जी, श्री मनीष जी, श्री रोहित एवं समस्त बागड़िया परिवार (सीतापुर वाले), दादाबाड़ी द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री हुकमचंद जी, श्री नितिन जी, श्री ललितपुर परिवार, श्री राजेन्द्र जी, हुकम काका, श्री प्रकाश हरसोरा, श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

वहीं श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती सुनिता जी एवं नवीन जी, हिण्डोली जैन परिवार को प्राप्त हुआ।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती शशि जी एवं श्री पारस जी बोराब परिवार को प्राप्त हुआ।

धर्मसभा में मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी की रिपोर्ट
मो.: 9929747312

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